दुनिया की सबसे खतरनाक दवाई, गर्भ में खा जाता था बच्चों का अंग!
दुनिया के चिकित्सा इतिहास में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जो आज भी रोंगटे खड़े कर देती है. इन्हीं में से एक है थैलिडोमाइड दवा की कहानी. 1950 के दशक में मॉर्निंग सिकनेस यानी गर्भावस्था में उल्टी-मितली से राहत दिलाने के लिए यह दवा दी जा रही थी. डॉक्टर इसे पूरी तरह सुरक्षित बता रहे थे, लेकिन इसने गर्भ में पल रहे बच्चों को भयानक नुकसान पहुंचाया.
थैलिडोमाइड दवा सबसे पहले जर्मनी में विकसित की गई थी. इसे 1957 में बाजार में लाया गया और जल्द ही 40 से ज्यादा देशों में बेचा जाने लगा. महिलाएं इसे नींद की दवा, चिंता कम करने और मॉर्निंग सिकनेस के इलाज के रूप में इस्तेमाल कर रही थीं. शुरुआती दिनों में सब कुछ ठीक लग रहा था. लेकिन 1960 के आसपास डॉक्टरों को एक अजीब पैटर्न नजर आने लगा. कई महिलाएं ऐसे बच्चों को जन्म दे रही थीं जिनके हाथ या पैर बिल्कुल नहीं थे, या बहुत छोटे और विकृत थे. जांच की गई तो खौफनाक खुलासा हुआ.
डॉक्टर्स ने पाया कि जो महिलाएं गर्भावस्था में इस दवा का सेवन कर रही थीं, उनके कुछ बच्चों के कान नहीं थे, आंखें प्रभावित थीं या आंतरिक अंग क्षतिग्रस्त थे. कई बच्चे जन्म के कुछ समय बाद ही मर जाते थे. जर्मनी के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर विडुकिंड लेंज ने इसकी जांच की और पाया कि समस्या थैलिडोमाइड दवा से जुड़ी है. यह दवा गर्भावस्था के शुरुआती 20-36 दिनों में भ्रूण के विकास को बुरी तरह प्रभावित कर रही थी– ठीक उसी समय जब कई महिलाओं को पता भी नहीं होता कि वे गर्भवती हैं. जब दवा को बाजार से हटाया गया (1961), तब तक नुकसान हो चुका था. दुनिया भर में 10,000 से ज्यादा बच्चे विकलांग पैदा हुए थे. हजारों गर्भपात और मृत जन्म भी हुए थे. सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के कई देश शामिल थे.
