छत्तीसगढ़ के प्रथम अमर बलिदानी वीर नारायण सिंह 

 प्रभात मिश्र
अखिल भारतीय साहित्य परिषद

१९वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास का गहन अध्ययन करने पर हमें अनेक घटनाओं के संदर्भ पढ़ने को और समझने को मिलते है. विद्रोह, विप्लव की यह कही अनकही ऐसी दास्तां है कि हममें से कोई भी व्यक्ति शायद ही उन तथ्यों से अनभिज्ञ होगा जो अनेकानेक हुतात्माओं की शौर्य गाथा है इन्हीं सब घटनाओं के बीच में एक सर्वप्रमुख घटना १८५७ ई. का है जिसे सुप्रसिद्ध विचारक एवं क्रांतिकारी स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम उद्धृत करते हैं, वही इतिहासकार विपिनचंद्र इसे कंपनी सरकार की नीतियों के विरुद्ध जनता के दिलों में संचित असंतोष एवं विदेशीसत्ता के प्रति घृणा का परिणाम बताते हैं —
घटनाक्रम जिस प्रकार से भी घटित हुए हों यह बात तो सुनिश्चित थी कि १८५७ की चिंगारी से ही साम्राज्यवादी अंग्रेजी सत्ता का किला जलकर भस्मीभूत हो गया था और देखते देखते समूचे भारतवर्ष में निरंकुश अंग्रेजी सत्ता के शोषण विरुद्ध वातावरण बनने लगा, स्वाधीनता की ज्योति प्रत्येक भारतीय में प्रज्जवलित होने लगी याद आते है
निराला और उनकी ये पंक्तियां** समर में अमर कर प्राण जागो फिर एक बार**

तब इसकी मशाल को अगणित शूरवीरों ने बुझने नहीं दिया था इथर तब का तत्कालीन छत्तीसगढ़ क्षेत्र १८१८ के सीताबर्डी युद्ध में अंग्रेजी सत्ता के पास चला जाता है इसके पश्चात अंग्रेजों का दमन चक्र तेज हो जाता है और उठता है इसके विरुद्ध एक स्वर जो बाद में बन जाता है सबका समवेत स्वर और इसे नेतृत्व प्रदान कर रहे थे नारायण सिंह शोषित – पीड़ित किसानों के हितों को लेकर लड़ने वाला जुझारू नेता, प्रजा हितैषी ,लोकप्रिय नायक नारायण सिंह जिन्हें सर्वप्रथम १९५६ में इतिहासविद हरि ठाकुर ने “वीर” की उपाधि से विभूषित किया. तत्पश्चात सोनाखान का अमर बलिदानी छत्तीसगढ़ गौरव वीर नारायण सिंह हो जाते हैं।
वीर नारायण सिंह के पूर्वज रतनपुर के कलचुरी नरेशों की सेना के समर्पित एवं पराक्रमी योद्धा थे.१४९३ ई. में बाहरेंद्र साय रतनपुर के राजा बनने के पश्चात राजा के द्वारा वीर नारायण सिंह के पूर्वजों के राज्यहित में योगदान को देखकर सोनाखान में जमींदारी प्रदान की गई. यह इस बात का सूचक है कि नारायण सिंह के पूर्वज राज्य एवं राजा के प्रति वफादार थे. जिसके फलस्वरूप उन्हें अन्य विश्वास पूर्ण कार्य भी समय -समय पर रतनपुर के राजा द्वारा प्रदान किये जाते रहे. ज्ञात हो कि १७४०- ४१में नागपुर(भोंसलों) के अधीन आ जाने से छत्तीसगढ़ का यह हिस्सा (सोनाखान) शासन की दृष्टि से प्रभावित होने लगा. और, पूर्व में हैहवंशी राजाओं से प्रदत्त सुविधाएं जो सोनाखान को प्राप्त हो रही थी (३००गांव में से १२गांव शेष रह गए) छीन ली गई. इस अन्याय के विरुद्ध नारायण सिंह के पूर्वजों ने लगातार अपना संघर्ष जारी रखा और गुलामी कभी स्वीकार नहीं की. परिणाम स्वरूप रामराय जो नारायण सिंह के पिता थे, के द्वारा तत्कालीन शासकों के विरुद्ध अपना अभियान जारी रखा. यह बात गौरतलब है कि उस दौर में भी रामराय को उनके प्रयासों के लिए प्रजा के द्वारा भरपूर समर्थन मिलता रहा.१८३० ई. में पिता की मृत्यु पश्चात नारायण सिंह ३५वर्ष की अवस्था में उत्तराधिकारी बन अपने पिता की परंपरा के सुयोग्य वाहक बनते हैं.

इस दौरान सोनाखान क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ गया. प्रजा को कंद, मूल, फल यहां तक कि पानी भी मिलना दूभर हो गया. इससे परेशान हो जनता सोनाखान में एकत्रित होना शुरू हो गई और लोगों ने जमींदार नारायण सिंह के नेतृत्व में व्यापारी माखन से संपर्क कर विनती की कि वह गरीब एवं किसानों के लिए अन्न एवं बीज उपलब्ध करा दें. और, अपना भंडार खोल दें. और, यह लेन – देन उधार पर होगा अच्छी फसल होने पर जो कीमत बनती है उसे व्यापारी को लौटा दिया जाएगा पर यह प्रस्ताव व्यापारी द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है. जिससे नारायण सिंह आक्रोशित हो गोदाम को खोलवाकर जरुरतमंद किसानों एवं गरीबों को उनकी आवश्यकता अनुसार अनाज वितरित कर देते हैं, नारायण सिंह अपने इस प्रयास के बारे में रायपुर के डिप्टी कमिश्नर इलियट को २९ अगस्त १८५६ को पत्र लिखकर सूचित करते हैं. और, अपने इन प्रयासों के पीछे के कारण को बताते हैं, नारायण सिंह का यह प्रयास सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के अनुरूप था. पर, ब्रिटिश सत्ता को यह गवारा नहीं था. इस पर नाराज होकर अंग्रेज इलियट ने गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया. और,२४ अक्टूबर १८५६ को उन्हें संबलपुर से गिरफ्तार कर रायपुर लाया जाता है. और, उन पर डांका डालने और हत्या तक के झूठे आरोप लगाकर रायपुर जेल में बंद कर दिया गया. जिससे आसपास के क्षेत्र में व्यापक प्रतिक्रिया अंग्रेजों के खिलाफ होने लगी. इस रोष से अंग्रेजों को भी भय होने लगा.
इस वक्त जब नारायण सिंह जेल में सजा काट रहे थे उसी समय मई १८५७ में मंगल पांडे के नेतृत्व में स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला पूरे देश के कोने -कोने में फैलने लगी. रोटी और कमल की पहचान चहुंओर गूंजने लगी. तभी वे २७ अगस्त १८५७की रात जेल में सुरंग बनाकर भाग निकलने में कामयाब हो जाते हैं, और, सोनाखान पहुंचते हैं और नारायण सिंह कृषकों और आदिवासियों की अपनी सेना बनाते हैं और संकल्प लेते हैं कि अंग्रेजों को अपने राज्य से बाहर खदेड़ देंगे. इसी बीच,२० नवंबर १९५७ को स्मिथ और नेपियर के नेतृत्व में नारायण सिंह के इस विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेज सेना जाती है.
अंग्रेजों की इस अभियान को जन समर्थन न मिलने से अंग्रेज सेना में भय व्याप्त हो जाता है. घबराकर बिलासपुर से भी सैनिक बुलाए जाते हैं पर इन लंबे प्रयासों के बाद भी अंग्रेज सैनिकों को बहुत लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ जाती है और नारायण सिंह की सेना से स्मिथ का सामना अंततः सोनाखान से लगभग कुछ दूरी पर नाले के पास होता हैं. इस मुठभेड़ में स्मिथ की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. पर, इस लंबे युद्ध में अंग्रेजों के पास तोप और बंदूकें अत्याधिक मात्रा में थीं. जबकि नारायण सिंह के पास इन चीजों की कमी होने लगी. अंततःतीर, तलवार और भाले से कब तक लड़ा जा सकता था. अंत में नारायण सिंह चारों ओर से घिर जाते हैं.और, उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर लाया जाता है, और, झूठे केस बनाकर उन्हें फांसी की सजा सुना दी जाती है. दिनांक १०दिसंबर १८५७ को ६२ वर्षीय वीर सपूत योद्धा वीरगति को प्राप्त होते हैं। छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत वीर नारायण सिंह को शत् शत् नमन।

 

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