धरती का बैलेंस बिगड़ा? एक हिस्सा तेजी से ठंडा तो दूसरा गर्म…
धरती ऊपर से भले शांत दिखती हो, लेकिन उसके अंदर लगातार हलचल चलती रहती है. अब एक नई रिसर्च बताती है कि हमारा ग्रह दोनों ओर बराबर रफ्तार से ठंडा नहीं हो रहा. खासकर वह हिस्सा जिसके नीचे प्रशांत महासागर फैला है, वह बाकी पृथ्वी के मुकाबले ज़्यादा तेजी से अपना तापमान खो रहा है. वैज्ञानिकों ने जब धरती के अंदर से निकलने वाली गर्मी के लंबे हिसाब को देखा, तो एक खास बात सामने आई. समंदरों के नीचे जो पतली परत होती है, उसे ओशैनिक क्रस्ट कहते हैं. यह परत नई बनती रहती है, पतली होती है और ऊपर से ठंडे पानी से घिरी होती है. इन तीन कारणों से यह हिस्सा गर्मी को बहुत आसानी से बाहर निकाल देता है.
दूसरी तरफ, ज़मीन वाला हिस्सा यानी कॉन्टिनेन्टल क्रस्ट काफी मोटा और पुराना है. मोटी परत में से गर्मी बाहर आने में ज्यादा समय लगता है. यही वजह है कि धरती के दोनों हिस्सों में गर्मी निकलने की रफ्तार अलग अलग हो गई है और यह फर्क लाखों सालों में साफ दिखने लगा है. इस वजह से प्लेटों की चाल, ज्वालामुखी और गहरी परतों की गतिविधि बदलती है वैज्ञानिकों का मानना है कि धरती के एक हिस्से के जल्दी ठंडा होने का असर प्लेटों की हलचल तक पहुंचता है. तापमान बदलने से धरती के अंदर की गरम चट्टानी परत यानी मेंटल के बहने की दिशा बदलती है. यही बहाव तय करता है कि नई पपड़ी कहाँ बनेगी, पुरानी पपड़ी कहाँ धरती के भीतर धँसेगी और टेक्टोनिक हलचल कहाँ ज्यादा होगी. प्रशांत महासागर वाला हिस्सा वैसे भी रिंग ऑफ फायर के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहाँ ज्वालामुखी और भूकंप काफी होते हैं. शोधकर्ता अब मानते हैं कि इस इलाके की ऐसी गतिविधि का संबंध धरती के इसी असमान ठंडे होने से भी हो सकता है. वैज्ञानिक इस खोज को धरती के बीते इतिहास को समझने की चाबी मानते हैं
यह सिर्फ आज की हलचल नहीं है. वैज्ञानिक बताते हैं कि आखिर धरती करोड़ों साल बाद कैसे बनी, कैसे बदली और आगे कैसे बदलेगी, इसकी कुंजी गर्मी के इसी प्रवाह में छिपी है. ऊपर के मौसम तो सूरज, समुद्र और हवाओं से बनते हैं, लेकिन अंदर क्या हो रहा है, वही धरती की असली बनावट तय करता है.
धरती के अंदर का ठंडा होना बहुत ही धीमी प्रक्रिया है. इतनी धीमी कि इंसानी इतिहास इसकी तुलना में कुछ भी नहीं. यह रिसर्च सिर्फ यह बताती है कि धरती भीतर से कैसे काम करती है, न कि यह कि हम किसी अचानक ठंडे दौर में घुसने वाले हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि सतह के मौसम का धरती के भीतर की ठंडक से कोई सीधा लेना देना नहीं है. हमारे यहाँ तापमान सूरज, बादल, महासागरों और हवा से तय होता है.
