‘क्षमा नहीं किया जा सकता है…’, प्रयागराज माघ मेला स्नान विवाद पर बोले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व पर संगम तट पर उस समय अफरा-तफरी मच गई जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को पुलिस ने रोक दिया. स्वामी जी सुबह 9 बजे करीब 200 अनुयायियों के साथ रथ और पालकी लेकर संगम नोज पहुंचे थे, लेकिन प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ का हवाला देकर उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा. इस दौरान समर्थकों और पुलिस के बीच तीखी झड़प और धक्का-मुक्की हुई. शंकराचार्य ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने अनादि काल से चली आ रही परंपरा को खंडित किया है.
सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर शंकराचार्य ने प्रशासन के परमिशन के तर्क पर कड़ा प्रहार किया. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी साधु-संत या सनातनी को गंगा स्नान के लिए अनुमति लेनी होगी. स्वामी जी ने कहा कि क्या कोई बच्चा अपनी मां से मिलने के लिए अनुमति लेता है. उन्होंने प्रशासन पर परंपरा को खंडित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि माघ मेले में अनादि काल से सम्मान के साथ स्नान की परंपरा रही है, जिसे अपमानित किया गया है.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार के अधीन मेला प्रशासन संतों और बटुकों के साथ ऐसा व्यवहार कैसे कर सकता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हमेशा नियम का पालन करते आए हैं और आगे भी करेंगे, लेकिन परंपराओं के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.फिलहाल इस घटना के बाद मेले में आए साधु-संतों और श्रद्धालुओं के बीच यह विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है.
वहीं, प्रयागराज पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार के अनुसार, संगम नोज पर उस समय लाखों की संख्या में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग मौजूद थे. उन्होंने बताया कि सुरक्षा के मद्देनजर वीवीआइपी स्नान पर रोक थी और स्वामी जी से केवल पैदल जाने का अनुरोध किया गया था. उधर, बैरिकेड तोड़ने के आरोप पर शंकराचार्य ने सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की मांग की है. उनका कहना है कि वे प्रशासन के साथ ही निकले थे और पुलिस ने ही वार्ता कर बैरिकेड खुलवाए थे.
बीते रविवार को शंकराचार्य का जुलूस करीब डेढ़ घंटे तक रुका रहा. पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कुछ अनुयायियों को जीप में बैठा लिया, जिससे माहौल और तनावपूर्ण हो गया. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनके लोगों के साथ मारपीट की गई और उनके धार्मिक ‘छत्र’ को भी तोड़ दिया गया. प्रशासन की कार्रवाई से असंतुष्ट होकर शंकराचार्य वहीं धरने पर बैठ गए और बिना संगम स्नान किए वापस चले गए.
