दुनिया पर मंडराया चावल का संकट, 11 साल में पहली बार घटेगी पैदावार
दुनिया के करोड़ों लोगों के मुख्य भोजन चावल को लेकर एक चिंताजनक खबर सामने आई है। ब्लूमबर्ग ने अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि साल 2026-27 के सीजन में वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट आ सकती है। पिछले एक दशक (11 साल) में यह पहला मौका होगा जब दुनिया भर में चावल की पैदावार कम होगी। USDA की रिपोर्ट में बताया गया है कि आगामी सीजन में वैश्विक चावल उत्पादन 538 मिलियन टन रहने का अनुमान है। भारत, म्यांमार और अमेरिका में सबसे ज्यादा गिरावट देखी जा सकती है। अमेरिका में किसानों द्वारा बुवाई कम करने के कारण पैदावार में 15% की कमी आ सकती है। चावल की रेकॉर्ड खपत और व्यापार के बीच उत्पादन कम होने से वैश्विक भंडार में भारी कमी आएगी।
पैदावार घटने के बड़े कारण
ईरान में जारी युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में भारी उछाल आया है। चावल की खेती में उर्वरक का अधिक इस्तेमाल होता है, इसलिए बढ़ती लागत के कारण एशिया के कई किसान इस बार बुवाई से पीछे हट रहे हैं।
दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देश भारत में मानसून पर अल नीनो का साया मंडरा रहा है। जून से शुरू होने वाले मानसून में औसत से कम बारिश होने की आशंका है, जिससे धान की फसल सीधे तौर पर प्रभावित हो सकती है।
चावल की कम आपूर्ति का असर अब कीमतों पर दिखने लगा है। एशिया के बेंचमार्क माने जाने वाले थाई चावल की थोक कीमतों में मार्च के अंत से अब तक 15% की वृद्धि हुई है। वहीं शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड में चावल का वायदा भाव (Futures) पिछले हफ्ते 8% उछला है, जो दो साल में सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त है। चावल की कमी के कारण फिलीपींस जैसे एशियाई देशों में खाद्य मुद्रास्फीति पहले से ही बढ़ने लगी है। एशियाई देशों के लिए चावल केवल भोजन नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था का आधार है। उत्पादन में कमी न केवल खाने की थाली को महंगा करेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर महंगाई को और हवा दे सकती है। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि वह अपने घरेलू भंडार और निर्यात के बीच कैसे संतुलन बनाए रखता है, खासकर तब जब मानसून अनिश्चित बना हुआ है।
