यहां मौत के बाद भी मुर्दों को नहीं है सुकून, बार-बार खोदी जाती है कब्र

मौत के बाद भी अगर मुर्दों को सुकून ना मिले और हर कुछ सालों में उनकी कब्र खोदी जाए तो? यह कल्पना भारत जैसे देश में सुनकर रोंगटे खड़े हो सकते हैं, लेकिन मेडागास्कर में यह एक प्यारी और सम्मानजनक परंपरा है. यहां के लोग मौत को अंत नहीं, बल्कि जीवन चक्र का एक पड़ाव मानते हैं. मेडागास्कर की सबसे अनोखी परंपरा है ‘फामादिहाना’ जिसका मतलब होता है ‘हड्डियों को घुमाना’ या ‘टर्निंग ऑफ द बोंस’. इस रिवाज में परिवार के सदस्य साल में एक निश्चित समय पर अपने दिवंगत परिजनों की कब्र खोदते हैं. हड्डियों को निकालकर नए रेशमी कपड़े में लपेटते हैं, घर ले आते हैं. वहां पूरे परिवार के साथ पार्टी, नाच-गाना, संगीत और भोज का आयोजन होता है. मान्यता है कि इससे पूर्वज खुश होते हैं और परिवार को आशीर्वाद देते हैं. इसके बाद हड्डियों को फिर से कब्र में सम्मानपूर्वक रख दिया जाता है. यह परंपरा आमतौर पर 5 से 7 साल में एक बार दोहराई जाती है.

मेडागास्कर के मूल निवासी मानते हैं कि आत्मा शरीर छोड़ने के बाद भी परिवार के साथ जुड़ी रहती है. मौत के बाद व्यक्ति कहीं नहीं जाता, बल्कि पूर्वज बनकर परिवार की रक्षा करता है. फामादिहाना के जरिए वे पूर्वजों को सम्मान देते हैं और उनके साथ ‘मिलते’ हैं. एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया, “हमारे पूर्वज हमें सपनों में मिलते हैं. जब हम उनकी हड्डियों को निकालकर उनके साथ समय बिताते हैं तो उन्हें खुशी मिलती है.”

समारोह आमतौर पर जून से सितंबर के बीच सूखे मौसम में आयोजित किया जाता है. परिवार के सदस्य कब्रिस्तान जाते हैं. कब्र खोदी जाती है. हड्डियों को सावधानी से निकाला जाता है. उन्हें नए कपड़े पहनाए जाते हैं क्योंकि पुराने कपड़े सड़ चुके होते हैं. फिर जुलूस निकाला जाता है. घर पहुंचकर संगीत बजता है, लोग नाचते हैं, खाते-पीते हैं और पुरानी यादें साझा करते हैं. बच्चों को भी पूर्वजों से परिचय कराया जाता है. कुछ जगहों पर हड्डियों को कंधे पर उठाकर नाचा भी जाता है. पूरा माहौल उत्सव जैसा होता है, शोक जैसा नहीं.

यह परंपरा मेडागास्कर की मूल मलागासी संस्कृति से जुड़ी है. इसमें पूर्वज पूजा (Ancestor Worship) का गहरा प्रभाव है. लोग मानते हैं कि यदि पूर्वजों का सम्मान नहीं किया गया तो वे नाराज होकर परिवार पर आफत ला सकते हैं. इसलिए फामादिहाना परिवार की खुशहाली और सुरक्षा के लिए जरूरी माना जाता है. आधुनिक समय में यह परंपरा कुछ चुनौतियों का सामना कर रही है. शहरों में लोग व्यस्त जीवन जीते हैं. महंगाई के कारण बड़े समारोह आयोजित करना मुश्किल हो रहा है. साथ ही कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पर्यावरणविद् कब्र खोदने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं. फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा पूरे जोश के साथ निभाई जाती है.