वैज्ञानिकों ने इंसान के दिमाग से ढूंढ निकाला 60 करोड़ साल पुराना रहस्य

क्या आप जानते हैं कि पौराणिक कहानियों में दिखाई जाने वाली ‘तीसरी आंख’ केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक सच हो सकती है? ग्रीक कहानियों के विशालकाय ‘साइक्लोप्स’ (एक आंख वाले राक्षस) की तरह हमारे दिमाग में भी एक आंख छुपी हुई है. वैज्ञानिकों की एक नई खोज ने दावा किया है कि इंसानों और रीढ़ की हड्डी वाले सभी जीवों का एक ऐसा पूर्वज था, जिसके माथे के ठीक बीच में केवल एक ही आंख हुआ करती थी. आज भले ही हम अपनी दो आंखों से दुनिया देखते हैं, लेकिन उस 60 करोड़ साल पुरानी आंख का अवशेष आज भी हमारे दिमाग के अंदर महफूज है.

करीब 60 करोड़ साल पहले समुद्र की गहराइयों में एक बेहद छोटा कीड़े जैसा जीव रहता था. वह ना तो ज्यादा तैरता था और ना ही इधर-उधर भागता था. वह एक ही जगह टिककर पानी से अपना खाना छानता था. वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआत में उसके पास दो आंखें थीं, लेकिन एक ही जगह रहने की वजह से उसे देखने की जरूरत खत्म हो गई. समय के साथ उसकी दोनों आंखें गायब हो गईं और माथे के बीच में सिर्फ एक रोशनी महसूस करने वाली आंख बची. इसे ‘साइक्लोप्स’ की तरह एक अकेली आंख कहा जा सकता है.

लाखों साल बाद जब इस जीव की नई नस्लों ने पानी में तैरना शुरू किया, तो उन्हें शिकार ढूंढने और दुश्मनों से बचने के लिए बेहतर नजर की जरूरत पड़ी. Lund University के प्रोफेसर डैन-ई निल्सन के मुताबिक, विकासक्रम (Evolution) ने नई आंखें बनाने के बजाय उसी पुरानी बीच वाली आंख के हिस्सों का इस्तेमाल किया. इसी से वो दो आंखें बनीं, जिनसे आज इंसान और अन्य जीव देखते हैं. यही वजह है कि हमारी आंखों की बनावट कीड़ों या ऑक्टोपस की आंखों से पूरी तरह अलग होती है.

इस रिसर्च का सबसे चौंकाने वाला सच यह है कि वो पुरानी अकेली आंख पूरी तरह खत्म नहीं हुई. वैज्ञानिकों का कहना है कि वो पुरानी आंख आज भी हमारे दिमाग के अंदर ‘पाइनियल ग्लैंड’ (Pineal Gland) के रूप में मौजूद है. यह दिमाग का एक छोटा सा हिस्सा है जो आज हमें देखने में मदद तो नहीं करता, लेकिन यह रोशनी और अंधेरे को पहचानता है.

जब रात को अंधेरा होता है, तो यह पाइनियल ग्लैंड ‘मेलटोनिन’ नाम का हार्मोन बनाता है. इसी हार्मोन की वजह से हमें रात में नींद आती है और सुबह रोशनी होते ही हमारी आंख खुल जाती है. कई जानवरों में यह ग्रंथि सीधे सिर की त्वचा से रोशनी महसूस कर सकती है. इंसानों में हमारी आंखें रोशनी का संदेश दिमाग तक पहुँचाती हैं, जिससे नींद का चक्र चलता है.

यह खोज साबित करती है कि कुदरत कभी भी पुरानी चीजों को बेकार फेंकती नहीं है, बल्कि उन्हें नया काम दे देती है. Lund University और ससेक्स यूनिवर्सिटी की यह रिसर्च इंसानी विकास के इतिहास को एक नया मोड़ देती है. तो अगली बार जब आपको रात में नींद आए, तो समझ जाइएगा कि आपके दिमाग में बैठी 60 करोड़ साल पुरानी ‘तीसरी आंख’ अपना काम कर रही है.