जब धरती पर इंसान का नामो-निशान नहीं था, तब भी मौजूद थे ये रंग-बिरंगे मेंढक!

उत्तर भारत के हरे-भरे जंगल न केवल देखने में बेहद खूबसूरत हैं बल्कि अपने आप में दुनियाभर की विविधता समेटे हुए हैं. अब वैज्ञानिकों ने इन जंगलों में मेंढकों (कैस्केड फ्रॉग) की तीन नई प्रजातियों की खोज की है. ये खास मेंढक वहां पर तेज़ बहाव वाली नदियों और झरनों में पाए जाते हैं. इसके साथ ही भारत में पहली बार इस मेंढक की पांच अन्य प्रजातियों को भी दर्ज किया गया है.

यह स्टडी दिल्ली यूनिवर्सिटी के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रो. एस. डी. बीजू की अगुवाई में वैज्ञानिकों की टीम ने की. इसके लिए टीम ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में 15 सालों से भी ज़्यादा समय तक रिसर्च की, जिसके बाद यह खोज सामने आई. अब यह स्टडी ‘बुलेटिन ऑफ द म्यूजियम ऑफ कंपैरेटिव जूलॉजी’ में प्रकाशित की गई है.

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने नदी और झरनों के तेज बहाव में रहने वाले मेंढकों की 300 से ज़्यादा आबादी का अध्ययन किया. इसके बाद उनकी डीएनए जांच और शारीरिक बनावट की तुलना की गई, जिसके बाद तीन नई प्रजातियों के होने की पुष्टि हुई.

प्रो. एस. डी. बीजू ने जिन 3 प्रजातियों की खोज की, उनमें अम्माची कैस्केड फ्रॉग (Amolops ammachi) त्रिपुरा की जम्पुई पहाड़ियों में मिली. बीजू की टीम ने इस प्रजाति का नामकरण केरल की समाज सेविका रहीं पद्मिनी वर्गीस के नाम पर किया. उन्होंने केरल में कई लोग ‘अम्माची’ (मां) कहकर पुकारते थे.

इसी तरह दूसरी प्रजाति नागालैंड में खोजी गई, जिसका नाम सेंडेन्यु कैस्केड फ्रॉग (Amolops sendenyu) रखा गया. यह नाम वहां के स्थानीय ‘सेंडेन्यु गांव’ के नाम पर रखा गया.

वहीं मेंढकों की तीसरी प्रजाति पश्चिम बंगाल में पाई गई. इन मेंढ़कों के शरीर का रंग हरा मिला और उन पर पीले-हरे या लाल-भूरे रंग का प्राकृतिक डिजाइन बना था. जिसके चलते उसे ब्यूटीफुल कैस्केड फ्रॉग (Amolops bella) नाम दिया गया.

वैज्ञानिकों ने मेंढ़कों की इन तीनों प्रजातियों के बारे में और जानने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने मेंढ़कों के विकास को समझने के लिए उनके इवोल्यूशनरी हिस्ट्री को समझने के लिए डीएनए-बेस्ड डेटिंग की. इससे पता चला कि इन मेंढ़कों का इतिहास करीब 3 करोड़ साल पुराना है. ये मेंढक लगभग 3.2 करोड़ साल पहले (इओसीन-ओलिगोसीन काल के दौरान) अलग-अलग प्रजातियों में विकसित होने लगे थे.

स्टडी में यह भी पता चला कि एशिया में इन मेंढकों का विकास पूर्व से पश्चिम की ओर कई चरणों में हुआ. हिमालय का शुरुआती निर्माण इनकी प्रजातियों के विकास और फैलाव का एक मुख्य कारण रहा.

रिसर्च टीम को लीड करने वाले प्रो. बीजू का कहना है कि इस मेंढक समूह पहचानना काफी मुश्किल था. हालांकि अब इनकी खोज के साथ ही जीवविज्ञान की कई उलझनों को सुलझा लिया गया है. इसकी वजह से उनकी सही पहचान और संरक्षण में मदद मिलेगी. यह खोज इस बात को भी साबित करती है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में अभी भी ऐसी कई प्रजातियां मौजूद हैं, जिनके बारे में हम नहीं जानते.