दिशा सालियान केस: FIR में उद्धव और आदित्य ठाकरे के नाम, क्या हैं आरोप, क्या होगी गिरफ्तारी?

दिवंगत एक्टर सुशांत सिंह की मैनेजर रहीं दिशा सालियान केस एक बार फिर चर्चा में है. इस मामले में सीबीआई की ओर से दर्ज एफआईआर में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, उनके बेटे और पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे समेत कई बड़े नाम शामिल किए गए हैं. एफआईआर में हत्या, गैंगरेप, आपराधिक साजिश, सबूत मिटाने और झूठी जानकारी देने जैसे गंभीर आरोपों की जांच की मांग की गई है.

हालांकि, यहां एक बेहद महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. एफआईआर में नाम आने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्तियों को आरोपी बनाया गया है. एफआईआर में जिन लोगों के नाम हैं, उनकी भूमिका की जांच की मांग की गई है. पुलिस की जांच के बाद ही तय होगा कि किस व्यक्ति के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और उसके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई की जाएगी.

दिशा सालियान की मौत के मामले में दर्ज एफआईआर में आदित्य ठाकरे के अलावा उनके पिता और तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का भी नाम है. इसके अलावा इसमें रोहन रॉय, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, सचिन वाजे, परमबीर सिंह, डीसीपी विशाल ठाकुर और तत्कालीन मंत्री अनिल देशमुख समेत कई लोगों की भूमिका की जांच की मांग की गई है.

पुलिस अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के नाम भी इसमें शामिल हैं. इनमें एपीआई अशोक देवाड़े, पीआई जगदेव कलापड़, पीआई शैलेंद्र नगरकर, पीआई चिमाजी आधव और पीआई अर्जुन राजाने समेत मालवणी पुलिस स्टेशन से जुड़े अधिकारी शामिल हैं. एफआईआर में पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्टरों और स्टाफ, फॉरेंसिक साइंस लैब के अधिकारियों और दूसरे पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है. यानी एफआईआर का दायरा सिर्फ राजनीतिक लोगों तक सीमित नहीं है. इसमें पुलिस, प्रशासन, फॉरेंसिक और अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की बात कही गई है.

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि दिशा सालियान की मौत के पीछे कथित साजिश और उसके बाद मामले को दबाने में कई लोगों की भूमिका हो सकती है. इसमें आरोप लगाया गया है कि मामले को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की गई और इसके लिए कथित तौर पर झूठी कहानी तैयार कर उसे फैलाया गया. एफआईआर में सरकारी रिकॉर्ड, केस से जुड़े दस्तावेज और फाइलों को कथित तौर पर नष्ट करने, दबाने या उनमें हेरफेर किए जाने की आशंका भी जताई गई है.
इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपियों को बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों, पुलिस मशीनरी और सरकारी संसाधनों का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया गया. हालांकि, ये एफआईआर में लगाए गए आरोप और जांच की मांग हैं. इन्हें अभी अदालत से साबित हुआ तथ्य नहीं माना जा सकता.

एफआईआर में मुख्य अपराध, कथित आपराधिक साजिश, आत्महत्या की कहानी तैयार करने और सबूतों को दबाने या नष्ट करने के संबंध में कई लोगों की भूमिका की जांच की मांग की गई है. इस सूची में आदित्य ठाकरे, रोहन रॉय, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड, रिया चक्रवर्ती और शोविक चक्रवर्ती के नाम हैं. इसके अलावा सचिन वाजे, परमबीर सिंह, DCP विशाल ठाकुर, उद्धव ठाकरे और अनिल देशमुख समेत कई पुलिस और सरकारी अधिकारियों के नाम भी हैं.
एफआईआर में रिजेंट गैलेक्सी बिल्डिंग के सुरक्षा गार्डों समेत कई अन्य लोगों की भूमिका की जांच की बात कही गई है. इनमें सुशील कुमार यादव और शिवमुराद गौतम उर्फ मुन्ना के नाम भी दर्ज हैं. इसके अलावा SIT के वरिष्ठ सदस्यों और उन वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की गई है, जिनकी निगरानी में कथित तौर पर गलत जांच या पूछताछ हुई.

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे या आदित्य ठाकरे की गिरफ्तारी हो सकती है? इसका सीधा जवाब है- सिर्फ एफआईआर में नाम होने से गिरफ्तारी नहीं होती. एफआईआर किसी अपराध की जांच शुरू करने का आधार होती है. इसके बाद पुलिस सबूत जुटाती है. बयान दर्ज किए जाते हैं. दस्तावेज और दूसरे साक्ष्यों की जांच होती है. अगर जांच में किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध में शामिल होने के पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तभी उसके खिलाफ गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है. इसलिए इस समय यह कहना सही नहीं होगा कि एफआईआर में नाम आने के कारण उद्धव ठाकरे या आदित्य ठाकरे की गिरफ्तारी तय है.

सीबीआई यह देखेगी कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों के समर्थन में क्या सबूत हैं. किस व्यक्ति की क्या भूमिका थी. क्या किसी ने साजिश में हिस्सा लिया. क्या किसी ने सबूत मिटाने या जांच को प्रभावित करने की कोशिश की. और क्या इन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है.

इस मामले में हत्या, गैंगरेप, आपराधिक साजिश, सबूत मिटाने और झूठी जानकारी देने जैसे गंभीर आरोपों की जांच की बात कही गई है. इन धाराओं की गंभीरता को देखते हुए मामला निश्चित तौर पर संवेदनशील है. लेकिन किसी एफआईआर में गंभीर धाराएं लग जाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि सभी नामजद लोगों ने अपराध किया है. किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच और उसके बाद न्यायिक प्रक्रिया जरूरी है. अब इस पूरे मामले में नजर इस बात पर होगी कि जांच एजेंसी एफआईआर में लगाए गए आरोपों की किस तरह जांच करती है और क्या नए सबूत सामने आते हैं.