दिवाली से पहले महंगाई का चौतरफा अटैक, जेब खाली… फिर कैसे करें खरीदारी?

सैलरी वहीं की वहीं थमी हुई है, लेकिन महंगाई है कि रुकने का नाम नहीं ले रही. जिसने रसोई से लेकर बाजार तक का पूरा गणित बिगाड़ दिया है. लेकिन त्योहार है, तो खरीदारी भी होगी. चाहे इसके लिए कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, दोस्तों से उधार मांगना पड़े या फिर क्रेडिट कार्ड सहारा बने, लोग पीछे नहीं हटते.

दरअसल, इस त्योहारी सीजन में आम आदमी की जेब खाली हो चुकी है. पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों ने सभी बुनियादी चीजों को महंगा कर दिया है. इस बार दिवाली का उल्लास तो भरपूर मनेगा, लेकिन इसके ठीक बाद गहराता आर्थिक संकट हर मिडिल क्लास फैमिली की नींद उड़ाने के लिए तैयार है.

त्योहार छोड़िए, आज मध्यम वर्गीय परिवार के सामने सबसे बड़ा संकट बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का है. पिछले कुछ समय में पेट्रोल और डीजल के दामों में जो तेजी आई है, उसने हर चीज का गणित बिगाड़ दिया है. क्योंकि जब ईंधन महंगा होता है, तो हर छोटी-बड़ी चीज चाहे वह सब्जी हो, दाल हो, कपड़े हों या फिर सजावट के सामान, सब महंगे हो जाते हैं. इसका सीधा असर खुदरा बाजार पर पड़ता है और कीमतें रॉकेट की रफ्तार से ऊपर भागती हैं.

खाने-पीने की चीजें जैसे तेल, आटा, मसाले और सब्जियां आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं. गृहिणियां समझ नहीं पा रही हैं कि सीमित बजट में घर आखिर कैसे चलाएं? क्योंकि नौकरीपेशा लोगों के वेतन में या तो कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है या फिर वह महंगाई दर के मुकाबले बहुत कम है. ऐसे में अधिकतर परिवारों की मंथली बचत पहले ही खत्म हो चुकी है.

अब सवाल उठता है कि जब रोजमर्रा की जिंदगी चलाना ही मुश्किल है, तो ऐसे में त्योहार पर खर्च के लिए पैसे कहां से आएंगे? जबकि इस बीच बाजार लुभावनी स्कीमों से पटा पड़ा है, ‘अभी खरीदें, बाद में भुगतान करें’, ‘नो कॉस्ट ईएमआई’, और ‘भारी छूट’. आम आदमी भी इन विज्ञापनों के झांसे में आसानी से आ जाते हैं. यहीं से कर्ज जाल में फंसना शुरू हो जाता है.

नए कपड़े, एलईडी टीवी, महंगे स्मार्टफोन और सोने के गहने खरीदना अब आसान हो गया है, क्योंकि लोग तुरंत भुगतान करने के बजाय किस्तों का सहारा लेते हैं. लेकिन ये किस्तें भारी पड़ती है, क्योंकि ऑफर के चक्कर में कई बार लोग आमदनी से ज्यादा खर्च कर देते हैं. लोग यह भूल जाते हैं कि क्रेडिट कार्ड या पर्सनल लोन पर लगने वाला ब्याज उनकी वित्तीय कमर तोड़ सकता है.

इस बीच जो पैसा अगले कुछ महीनों के राशन, बच्चों की फीस या इमरजेंसी के लिए होना चाहिए था, वह त्योहारी बिल चुकाने में चला जाता है. एक कर्ज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेने की यह आदत परिवारों को कर्ज के कुचक्र में धकेल देती है.

आम आदमी के पास क्या सचमुच कोई दूसरा रास्ता नहीं है? यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में आता है, जो इस व्यवस्था से जूझ रहा है. क्योंकि लोग त्योहार आने से पहले कोई आर्थिक योजना नहीं बनाते. जब समय सिर पर आता है, तो बिना सोचे-समझे खर्च कर देते हैं. लेकिन ये हकीकत है कि महंगाई और आमदनी का यह अंतर रातो-रात खत्म नहीं होने वाला है, ये आंकड़े भी चीख-चीख कर बता रहे हैं.

दुनियाभर में महंगाई तेजी से बढ़ रही है, बढ़ती महंगाई की वजह से केंद्रीय बैंकों को कर्ज महंगा करना पड़ रहा है. अमेरिका जैसा विकसित देश महंगाई से जूझ रहा है, और फेड रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाने के लिए लाचार है. भारत में भी पिछले हफ्ते ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट का इजाफा किया, जबकि इस साल रेपो रेट और 50 बेसिस प्वाइ्ंट्स बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है.

फेस्टिव सीजन से ठीक पहले रेपो रेट बढ़ने से तमाम तरह के कर्ज महंगे हो गए हैं. होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन लेने वाले करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवारों की EMI बढ़ गई है. पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी को लोन की बढ़ी हुईं किस्तें आने वाले दिनों में और परेशान करेंगी.

रही सही कसर महंगाई दर ने पूरी कर दी है. खुदरा महंगाई दर 2 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि थोक महंगाई दर की बात करें, तो ये भी डबल डिजिट में पहुंच गई है. दशहरा से ठीक पहले दोनों आंकड़े सामने आए हैं, सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई. जबकि अगस्त में खुदरा महंगाई दर 4.82% थी. खाने-पानी के चीजें से तेजी से महंगी हुई हैं, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति अगस्त के 5.97% से बढ़कर सितंबर में 7.74% पर पहुंच गई. खासकर सब्जियों, दालों और रोजमर्रा की जरूरत की अन्य चीजों के महंगे होने से आम आदमी की थाली पर सीधा असर पड़ा है. प्याज, चीनी और खाने के तेल की कीमतों में साल भर के अंदर बड़ा इजाफा हुआ है.

खुदरा के बाद थोक महंगाई दर ने आम आदमी को झटका दे दिया है. थोक मूल्य सूचकांक (WPI) सितंबर में उछलकर 11.39% पर पहुंच गई, जबकि अगस्त में यह 9.92% थी. थोक बाजार में ईंधन, बिजली और विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में आई भारी तेजी इसके मुख्य कारण रहे.

थोक महंगाई का यह स्तर बताता है कि आने वाले दिनों में कंपनियों की लागत बढ़ने से बाजार में सामान और ज्यादा महंगे हो जाएंगे, जिसका सीधा बोझ अंतिम उपभोक्ता यानी आम जनता को ही उठाना पड़ेगा. सितंबर में खाद्य सूचकांक की महंगाई बढ़कर 8.66% हो गई, जो कि अगस्त में 7.05 फीसदी थी. यानी त्योहारों के बीच आम आदमी को महंगाई की चौतरफा मार पड़ने वाली है.

इसलिए आखिर में आपको सलाह दी जाती है, त्योहार हर साल आते हैं, अगले साल भी आएंगे, खुद को आर्थिक संकट में डालकर फिजूलखर्ची से बचने में ही भलाई है. बाजार जाने से पहले ही तय कर लें कि इस बार आप कुल कितने पैसे खर्च करेंगे? उस सीमा से एक रुपया भी ज्यादा खर्च न करें. क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल से बचें, क्योंकि इससे खर्च करने का अहसास तुरंत नहीं होता है. अगर पैसे हाथ से जाएंगे या खाते से सीधे कटेंगे, तो फिजूलखर्च अपने आप रुक जाएगा.