वोटिंग से कुछ घंटे पहले अमेरिका का ईरान पर हमला, केश्म द्वीप पर 5 धमाके
अमेरिका में मंगलवार को मिडटर्म चुनाव के लिए वोटिंग होनी है। इससे पहले सोमवार को ईरान के केश्म द्वीप पर कम से कम पांच जोरदार धमाके हुए। कुछ दूर पर बंदर लेंगेह शहर में भी विस्फोट की खबर है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि यह हमला अमेरिका ने किया है।
हालांकि, ईरानी मीडिया ने इसके पीछे अमेरिका या इजराइल का हाथ होने की पुष्टि नहीं की है। उसने अमेरिका के दो MQM-170 जासूसी ड्रोन मार गिराने का दावा किया है। केश्म द्वीप करीब 1,445 वर्ग किलोमीटर में फैला, ईरान का सबसे बड़ा द्वीप है। यह कभी फ्री-ट्रेड जोन और टूरिस्ट स्पॉट के लिए जाना जाता था। अब यह बड़े सैन्य ठिकाने में बदल चुका है।
होर्मुज स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर मौजूद यह द्वीप रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। अमेरिका इसे कई वजह से बड़ा सैन्य खतरा मानता है।
अंडरग्राउंड सैन्य नेटवर्क: रिपोर्ट्स के मुताबिक, केश्म द्वीप के नीचे सुरंगों और नमक की गुफाओं का बड़ा नेटवर्क है। यहां ईरान ने तटीय मिसाइल सिस्टम और तेज हमला करने वाली नौकाएं छिपा रखी हैं।
समुद्री रास्तों पर नियंत्रण के लिए अहम: द्वीप के अंदर ईरान ने ऐसे सैन्य ठिकाने बनाए हैं, जिनका मकसद समुद्री रास्तों पर नियंत्रण रखना है। माना जाता है कि यहां से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही रोकी या सीमित की जा सकती है।
दुनिया की तेल सप्लाई पर असर: होर्मुज स्ट्रेट तेल और गैस के लिहाज से दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। अमेरिका के मुताबिक, ईरान ने केश्म द्वीप का इस्तेमाल तेल टैंकरों की आवाजाही रोकने या दबाव बनाने के लिए किया है।
इससे पहले सोमवार को ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका फिलहाल ईरान पर दोबारा हमला करने की तैयारी नहीं कर रहा है। वजह- तेहरान के साथ समझौता हो सकता है।
पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि क्या वे मंगलवार को होने वाले अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमला करने पर विचार कर रहे हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया- नहीं।
ट्रम्प ने ईरान के साथ समझौते की भी उम्मीद जताई। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दावा किया कि ईरान के साथ बड़े युद्ध की आशंका कम होने से तेल की कीमतों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आई है। ट्रम्प ने इसे रिकॉर्ड गिरावट बताया।
31 अक्टूबर को तेल की कीमतें 118 डॉलर प्रति बैरल थीं। 1 नवंबर को यह 108 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गईं।
