’80 साल का हूं, क्या जेल में मारना चाहते हैं?’, सुप्रीम कोर्ट पहुंचे आजम खान ने मांगी जमानत
सुप्रीम कोर्ट में समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद आजम खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों और ईडी की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए. आजम खान ने रामपुर जेल से रिहाई के बाद दो पैन कार्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से की गई गिरफ्तारी को चुनौती दी है.
इसके साथ ही उन्होंने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े धनशोधन मामले में एक नवंबर के न्यायिक हिरासत के आदेश को भी चुनौती दी है. सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि ईसीआईआर के आधार पर अब 22 नए मामले दर्ज किए गए हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने कहा कि हाई कोर्ट ने बार-बार राहत दी है और इस तरह की राहत वहां आसानी से मांगी जा सकती है. इस पर सिब्बल ने मामले का पुराना घटनाक्रम बताते हुए कहा कि साल 2006 की एक घटना को लेकर 2019 में 26 एफआईआर दर्ज की गई थीं. इनमें से ज्यादातर मामलों में जमानत मिल गई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें 2022 से 2025 तक जेल में रहना पड़ा. सिब्बल ने दलील दी कि उन्हें जेल में रखने की मंशा से लगातार मामले दर्ज किए जा रहे हैं.
आजम खान की तरफ से पैरवी करते हुए सिब्बल ने कहा, ‘मेरे खिलाफ कुल 87 एफआईआर थीं और सभी में जमानत मिलने के बाद 88वां मामला दर्ज किया गया. मैं 80 साल का हूं… उन्होंने मेरे खिलाफ नए मामले इसलिए दर्ज किए हैं ताकि मेरी मौत जेल में ही हो जाए.’
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने जमानत दी थी. इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन नई शिकायतें दर्ज कीं. इनमें जन्म प्रमाणपत्र को गलत बताया गया और आरोप लगाया गया कि पैन कार्ड तथा पासपोर्ट गलत जानकारी के आधार पर बनवाए गए. सिब्बल ने कहा कि पैन कार्ड मामले में जमानत मिलने के बावजूद उन्हें पांच साल तक जेल में रहना पड़ा.
सिब्बल ने दलील दी कि याचिकाकर्ता (आजम) की उम्र 80 साल है और उनके खिलाफ लगातार नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं, ताकि उन्हें जेल में ही रखा जा सके. उन्होंने कहा, “हम मुकदमे की सुनवाई को चुनौती नहीं दे रहे हैं, हम सिर्फ जमानत मांग रहे हैं.” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईडी ने अब तक 28 ईसीआईआर दर्ज की हैं और यह पूरी तरह से प्रताड़ित करने की कार्रवाई है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब 2006 में घटना हुई थी, तो 2019 में एफआईआर कैसे दर्ज की जा सकती है, जबकि उस समय याचिकाकर्ता सत्ता में भी नहीं थे.
इस पर सीजेआई ने कहा कि इस मामले को हाई कोर्ट भेजा जाएगा और उससे एक सप्ताह के भीतर सुनवाई करने का अनुरोध किया जाएगा. जरूरत पड़ने पर हाई कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ के सामने भी मामला रखा जा सकता है. सीजेआई ने कहा कि हाई कोर्ट को इस मामले की सुनवाई करने दी जाए.
सिब्बल ने अदालत से मामलों की सूची देखने का आग्रह करते हुए कहा कि कथित घटना 2006 की है, जबकि एफआईआर 2019 में दर्ज की गईं. सुनवाई के दौरान जस्टिस जे. बागची ने दो नई एफआईआर का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इनमें से एक मामला विश्वविद्यालय के लिए जमीन की कथित जबरन वसूली से जुड़ा है. राज्य सरकार का दावा है कि याचिकाकर्ता के प्रभावशाली पद पर होने के कारण पहले एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी.
जस्टिस बागची ने कहा कि इस मामले का मुख्य आरोप जबरन वसूली है और उपलब्ध सामग्री में आयकर से जुड़े कुछ निष्कर्ष दिखाई देते हैं, जिनमें विश्वविद्यालय के प्रशासन से संबंधित बड़ी रकम का हिसाब नहीं मिलने की बात सामने आई थी. जस्टिस बागची ने आगे कहा कि जब मामला लगभग अंतिम चरण में पहुंच गया था, उसी दौरान आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने गबन के आरोप में एफआईआर दर्ज कर दी. उन्होंने कहा कि इस मामले की शुरुआत विश्वविद्यालय के धन के कथित दुरुपयोग से जुड़ी शिकायत से हुई और इसमें जबरन वसूली के आरोप भी लगाए गए हैं.
