स्पेस में भेजीं 3,300 रानी मधुमक्खियां, जीरो ग्रेविटी में टकराने के बाद बनाया अनोखा रिकार्ड!

अंतरिक्ष में इंसानों के कदम तो अब तक कई बार पड़ चुके हैं, लेकिन जब वैज्ञानिकों ने जमीन पर भनभनाने वाली नन्हीं मधुमक्खियों को स्पेस में भेजा, तो जो नतीजा सामने आया उसने हर किसी को हैरान कर दिया. जरा सोचिए, जहां बिना गुरुत्वाकर्षण के इंसान के लिए एक-एक कदम संभालना मुश्किल हो जाता है, वहां करीब 3,301 मधुमक्खियां जीरो ग्रेविटी में तैर रही हों! साल 1984 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने कुछ ऐसा ही प्रयोग किया था. नासा के वैज्ञानिक यह देखना चाहते थे कि क्या मधुमक्खियां बिना ग्रेविटी के उड़ सकती हैं और क्या वे अपना छत्ता बना सकती हैं?

7 दिनों के इस मिशन की शुरुआत में मधुमक्खियों को शुरुआती दिनों में काफी समस्या हुई और उड़ते समय वे बॉक्स की दीवारों से टकराने लगीं. लेकिन, कुछ ही दिनों में उन्होंने खुद को अंतरिक्ष के माहौल में ढाल लिया. मिशन के आखिरी दिनों तक मधुमक्खियां सामान्य तरीके से उड़ने लगी थीं और उन्होंने स्पेस में करीब 200 सेंटीमीटर का छत्ता भी बना लिया था.

नासा का यह प्रयोग STS-41C मिशन का हिस्सा था और इसके दो उद्देश्य थे. वैज्ञानिक यह देखना चाह रहे थे कि माइक्रोग्रेविटी में मधुमक्खियां कैसा व्यवहार करती हैं और क्या वे वहां जीवित रह भी पाती हैं या नहीं. इसके साथ ही, वैज्ञानिक स्पेस में बने छत्ते की तुलना पृथ्वी पर बनने वाले छत्तों से करना चाहते थे.

इन मधुमक्खियों को एक विशेष रूप से डिजाइन किए गए बॉक्स में रानी मधुमक्खी, लकड़ी के फ्रेम और भोजन के साथ रखा गया था. नासा ने उनके भोजन के लिए चीनी, पानी और अगर का एक मिश्रण तैयार किया था, क्योंकि अंतरिक्ष में सामान्य तरल पदार्थ बूंद बनकर तैरने लगते हैं.

अंतरिक्ष यान की लॉन्चिंग के दौरान मधुमक्खियां सुरक्षित रहीं, लेकिन जीरो ग्रेविटी में उड़ना उनके लिए पूरी तरह से नया एक्सपीरियंस था. शुरुआती जांच में सामने आया कि जब मधुमक्खियों ने उड़ने का प्रयास की, तो वे अपने बॉक्स की ही दीवारों से टकराने लगीं. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, उनके व्यवहार में बदलाव आने लगा.

सातवें दिन तक अंतरिक्ष यात्रियों ने बताया कि मधुमक्खियों ने जीरो ग्रेविटी के माहौल को पूरी तरह अपना लिया था और वे आत्मविश्वास के साथ उड़ने लगी थीं. क्रू मेंबर्स ने लिखा कि सातवें दिन तक छत्ता अच्छी तरह बन चुका था और मधुमक्खियां जीरो ग्रेविटी में ढल चुकी थीं. अब वे बॉक्स की ऊपरी सतह से नहीं टकरा रही थीं और एक जगह से दूसरी जगह आसानी से उड़कर जा रही थीं.

मधुमक्खियों ने स्पेस में न सिर्फ खुद को संभाला, बल्कि अपना काम भी शुरू कर दिया. स्पेस में बंद मधुमक्खियों ने पूरे मिशन के दौरान लगभग 200 सेंटीमीटर लंबा छत्ता तैयार किया. रिसर्चर्स ने पाया कि स्पेस में बने छत्ते और पृथ्वी के छत्ते में कुछ अंतर थे.

अंतरिक्ष में बने छत्ते के खानों का व्यास पृथ्वी के मुकाबले छोटा था और उनकी दीवारें ज्यादा मोटी थीं. वहीं, मधुमक्खियां सामान्य गहराई वाले खाने बनाने में सफल रहीं और उन्होंने कुछ खानों में अपनी शुगर सिरप भी जमा की. मिशन के अंत में ज्यादातर मधुमक्खियां जीवित मिलीं. इस दौरान रानी मधुमक्खी ने लगभग 35 अंडे भी दिए थे, लेकिन पृथ्वी पर लौटने के बाद उनमें से बच्चे नहीं निकल सके. इसके पीछे का कारण सामने नहीं आ सका.