होलिका दहन पर आज इतने बजे से शुरू होगा भद्रा का साया, जानें क्या रहेगा पूजन का मुहूर्त

इस बार होलिका दहन की तिथि को लेकर काफी ज्यादा भ्रम की स्थिति फैली हुई है. कोई कह रहा है कि 2 मार्च यानी आज होलिका दहन करना सही होगा तो कई लोग कह रहे हैं कि 3 मार्च के दिन दहन करना सही होगा. लेकिन, असमंजस में भी पंडितों ने होलिका दहन की सही तिथि बता दी है. दरअसल, लोगों में होलिका दहन को लेकर असमंजस की स्थिति इसलिए बनी हुई है क्योंकि 2 मार्च यानी आज शाम से पूर्णिमा शुरू हो रही है, जो कि 3 मार्च तक रहेगी. इसके अलावा इस तिथि में भद्रा के साए का भी संयोग बन रहा है.

द्रिक पंचांग के मुताबिक, फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 2 मार्च यानी आज शाम 5 बजकर 55 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 3 मार्च की शाम 5 बजकर 07 मिनट पर होगा. द्रिक पंचांग के अनुसार, 2 मार्च यानी आज भद्रा का साया शाम 5 बजकर 55 मिनट से शुरू होगा और यह 3 मार्च यानी कल सुबह 5 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगा. ऐसे में पंडित प्रवीण मिश्र के मुताबिक, जो लोग आज प्रदोष काल और भद्रा के दौरान होलिका दहन करना चाहते हैं तो उनके लिए आज शाम 6 बजकर 22 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 53 मिनट के बीच होलिका दहन कर सकते हैं. 3 मार्च को चंद्र ग्रहण लग जाएगा और 4 मार्च 2026, बुधवार को धुलंडी यानी होली आराम से खेली जा सकती है.

होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की शाम को किया जाता है और यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है. इसकी कथा प्रह्लाद और होलिका से जुड़ी है. इस दिन खुले स्थान पर लकड़ी और उपलों से होलिका सजाई जाती है. शुभ मुहूर्त में लोग रोली, चावल, फूल, नारियल और नई फसल चढ़ाकर पूजा करते हैं, फिर होलिका के चारों ओर सूत लपेटकर परिक्रमा करते हैं. इसके बाद अग्नि प्रज्वलित की जाती है और गेहूं या चना अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है.

होलिका दहन की कथा भक्त प्रह्लाद और दैत्यराज हिरण्यकश्यप से संबंधित है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, हिरण्यकश्यप खुद को भगवान मानता था और चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. इससे क्रोधित होकर उसने कई बार प्रह्लाद को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच गया. अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था. होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई. इसी घटना की याद में हर साल होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है.

होलिका दहन की अग्नि किन लोगों को नहीं देखनी चाहिए.

1. जिन माता-पिता की केवल एक ही संतान होती है, उन्हें अग्नि से दूर रहने को कहा जाता है. मान्यता है कि यह स्थिति उनके लिए संवेदनशील मानी जाती है, इसलिए घर के अन्य सदस्य पूजा करें तो बेहतर रहता है.

2. नवजात शिशु और छोटे बच्चों को भी होलिका दहन स्थल पर ले जाने से बचना चाहिए. वहां धुआं, भीड़ और तेज आग होती है, जो उनके लिए ठीक नहीं मानी जाती. जिन बच्चों का मुंडन संस्कार नहीं हुआ है, उन्हें भी दूर रखने की सलाह दी जाती है.

3. गर्भवती महिलाओं को भी सावधानी रखने के लिए कहा जाता है. तेज धुआं और गर्मी उनकी सेहत पर असर डाल सकती है, इसलिए दूरी बनाकर रखना बेहतर माना जाता है.

4. नई शादीशुदा महिलाओं को पहली होली पर होलिका दहन न देखने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है. मान्यता है कि पहली होली मायके में मनाना शुभ रहता है.

5. सास और बहू को भी एक साथ खड़े होकर होलिका दहन देखने से बचने की सलाह दी जाती है. लोक मान्यता के अनुसार इससे रिश्तों में खटास आ सकती है, इसलिए अलग-अलग समय पर दर्शन करना बेहतर माना जाता है.