चीन ने रोकी बुलेट ट्रेन पर TBM मशीन, फिर मोदी ने जो किया, चीन के 440 Billion डॉलर पर धमाका
पूरी दुनिया में बढ़ते भारत के दबदबे से चीन इस कदर चिढ़ा बैठा है कि वो भारत के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स को चुपके से अटकाने की फिराक में रहता है. हालांकि, इस बार चीन की एक ऐसी ही चाल बैकफायर हो गई और भारत ने उसे सीधा बाहर का रास्ता दिखा दिया. चीन की इस चालाकी का नतीजा ये हुआ कि भारत का ‘आत्मनिर्भर’ बनने का संकल्प और मजबूत हो गया. अब भारत की एक मशीन न सिर्फ देश को, बल्कि पूरी दुनिया को ‘ड्रैगन प्रूफ’ बनाने के मिशन पर निकल पड़ी है.
दरअसल, ये पूरी कहानी जर्मन कंपनी की टनल बोरिंग मशीन (TBM) की डिलीवरी से जुड़ी है, जिसमें चीन ने अड़ंगेबाजी की है. टनल बोरिंग मशीनें (TBMs) बनाने वाली मुख्य कंपनी जर्मनी की ‘हेरेनक्नेच’ है, लेकिन इन भारी-भरकम मशीनों का फिजिकल प्रोडक्शन यानी निर्माण चीन में मौजूद फैक्ट्रियों में किया जाता था. ये मशीनें चीन की धरती पर बनकर तैयार होती थीं, इसलिए वहां के प्रशासनिक और एक्सपोर्ट नियमों का सीधा असर इन पर पड़ता था.
जब भारत के मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन और दूसरे बड़े मेट्रो प्रोजेक्ट्स के लिए इन मशीनों को चीन से भारत भेजने की बारी आई तो चीन सरकार ने एक्सपोर्ट क्लीयरेंस देने में पेच फंसा दिए और जानबूझकर भारी देरी की. यानी कंपनी और टेक्नोलॉजी भले ही जर्मनी की थी, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चीन में होने के कारण चीन ने ग्लोबल सप्लाई चेन पर अपनी पकड़ का फायदा उठाया और भारत के प्रोजेक्ट्स की रफ्तार रोकने के लिए कूटनीतिक अड़ंगा लगा दिया.
इस चालबाजी ने भारत को ऐसा झटका दिया, जिसने ‘चीन आउट’ का रास्ता साफ कर दिया है. बुलेट ट्रेन और मेट्रो प्रोजेक्ट्स में आई रुकावट के बाद भारत ने सबक लेते हुए अब इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी-भरकम मशीनों के मामले में चीन पर निर्भरता पूरी तरह खत्म करने का फैसला कर लिया है.
भारत सरकार अब देश में ही इन हाई-टेक मशीनों के निर्माण के लिए पीएलआई की तर्ज पर नई इंसेंटिव योजना ला रही है. भारत का ये मास्टरप्लान न केवल अपनी परियोजनाओं से चीन को बाहर का रास्ता दिखाएगा, बल्कि भारत में बनी ‘मेड इन इंडिया’ मशीनें आने वाले वक्त में पूरी दुनिया के इंफ्रास्ट्रक्चर को भी ‘ड्रैगन प्रूफ’ बनाने का काम करेंगी.
जब तक हम अपनी सड़कों, पुलों, खदानों और रेल कॉरिडोर को बनाने के लिए जरूरी मशीनों और उनके स्पेयर पार्ट्स के लिए चीन जैसे देशों पर निर्भर रहेंगे, तब तक हमारी तरक्की की चाबी दूसरों के हाथों में रहेगी. इसी कमजोरी को खत्म करने के लिए भारत सरकार ‘कंस्ट्रक्शन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग’ के लिए एक बड़ा इंसेंटिव पैकेज लाने की तैयारी कर रही है, ताकि हर छोटी-बड़ी क्रिटिकल मशीन अब अपने ही देश में तैयार हो सके.
जब हम शानदार एक्सप्रेसवे पर गाड़ी चलाते हैं या नई मेट्रो में सफर करते हैं तो हमारा ध्यान सिर्फ बनी हुई पटरियों या चमचमाती सड़कों पर जाता है. लेकिन इन्हें आकार देने वाली क्रेन, अर्थमूविंग मशीनें, माइनिंग एक्सकेवेटर और टनल बोरिंग मशीनें भी बड़ी भूमिका निभाती हैं. BCG और CII की एक ताजा रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि ये सेक्टर भारत की आर्थिक रीढ़ है.
बात सिर्फ सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं है, अब देश के माइनिंग सेक्टर में भी बड़ी क्रांति आ रही है. इलेक्ट्रिक गाड़ियों, सोलर पैनलों और एडवांस टेक्नोलॉजी के लिए भारत को आज ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ जैसे लिथियम, कोबाल्ट और निकल की सख्त जरूरत है.
BCG की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का माइनिंग और कंस्ट्रक्शन आउटपुट लगभग 430 बिलियन डॉलर है, जो देश की कुल जीडीपी का करीब 11% हिस्सा है और 7 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका चलाता है. जैसे-जैसे खदानों में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ेगा, एडवांस ड्रिलिंग सिस्टम, क्रशिंग इक्विपमेंट और विशाल एक्सकेवेटर की मांग में भारी उछाल आएगा. अगर ये भारी मशीनें भी भारत में बनने लगें तो चीन की दादागिरी पूरी तरह खत्म हो जाएगी.
कदम आगे बढ़ चुके हैं लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए कुछ कमियों को दूर करना जरूरी है. आज भी कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट के मामले में भारत का मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है.
सरकार की नई इंसेंटिव योजना का टारगेट इसी गैप को भरना है. योजना का जोर केवल उन आम मशीनों पर नहीं होगा जो भारत पहले से बना रहा है, बल्कि इसका मुख्य ध्यान उन टनल बोरिंग मशीनों और हाई-टेक कंपोनेंट्स के घरेलू निर्माण को बढ़ावा देना होगा जिनके लिए हम चीन पर निर्भर थे.
ग्लोबल लेवल पर माइनिंग और कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट की इंडस्ट्री लगभग 420 से 440 बिलियन डॉलर की है, जिसमें से सालाना ग्लोबल इंपोर्ट 150 बिलियन डॉलर के आसपास होता है. भारत के पास इस मार्केट का फिलहाल 4% से भी कम हिस्सा है, लेकिन पिछले एक दशक में भारत का इक्विपमेंट एक्सपोर्ट लगभग तीन गुना बढ़कर $4.9 बिलियन हो चुका है. यानी अब भारत इंपोर्ट से ज्यादा एक्सपोर्ट कर रहा है!
साउथ ईस्ट एशिया, अफ्रीका, खाड़ी देशों और दक्षिण अमेरिका जैसे इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश हो रहा है. आज इन देशों की 50% मशीनों की सप्लाई अकेला चीन करता है लेकिन चीन की डामाडोल नीतियों और ब्लैकमेलिंग से तंग आकर अब दुनिया भर के देश ‘चीन+1’ की नीति अपना रहे हैं. वो चीन का एक मजबूत और भरोसेमंद विकल्प खोज रहे हैं और भारत ठीक उसी जगह अपनी मजबूत पहचान बना रहा है.
