सिर्फ बिजली ही नहीं, अब आसमान से पानी भी बरसाएंगे सोलर पैनल!
जब भी हम सोलर पैनल का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले धूप, बिजली और महंगे बिजली बिल से छुटकारा पाने का ख्याल आता है. लेकिन क्या यह सोच सकते हैं कि यही सोलर पैनल आसमान से झमाझम बारिश भी करवा सकता है? सुनने में यह भले ही कहानी जैसा लगता हो, लेकिन जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इसे सच साबित करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. जर्मनी के रिसर्चर्स ने यह दावा किया है कि रेगिस्तान मीलों दूर तक फैले काले सोलर पैनल अब सिर्फ ग्रीन एनर्जी ही नहीं बनाएंगे, बल्कि बारिश कराने के लिए ‘रेन मेकर’ भी बन सकते हैं जब भी हम सोलर पैनल का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले धूप, बिजली और महंगे बिजली बिल से छुटकारा पाने का ख्याल आता है. लेकिन क्या यह सोच सकते हैं कि यही सोलर पैनल आसमान से झमाझम बारिश भी करवा सकता है? सुनने में यह भले ही कहानी जैसा लगता हो, लेकिन जर्मनी के वैज्ञानिकों ने इसे सच साबित करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है. जर्मनी के रिसर्चर्स ने यह दावा किया है कि रेगिस्तान मीलों दूर तक फैले काले सोलर पैनल अब सिर्फ ग्रीन एनर्जी ही नहीं बनाएंगे, बल्कि बारिश कराने के लिए ‘रेन मेकर’ भी बन सकते हैं
जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ होहेनहाइम के वैज्ञानिकों ने अपनी नई रिसर्च में कुछ ऐसा ही दावा किया है कि सोलर पैनल से रेगिस्तान में भी बारिश कराई जा सकती है. वैज्ञानिकों ने स्केलिंग आर्टिफिशियल हीट आइलैंड्स टू एन्हांस प्रेसिपिषन इन द यूनाइटेड अरब एमिरेट्स नाम की एक स्टडी की है. इस स्टडी में जानकारी सामने आई है कि अगर सोलर पैनलों का दायरा एक निश्चित आकार से बड़ा हो, तो वे स्थानीय मौसम पर असर डाल सकते हैं और उन्हें प्रभावित कर सकते हैं. इससे बारिश लाने में भी मदद मिल सकती है.
सोलर पैनल और उनके स्ट्रक्चर गहरे काले रंग के होते हैं. ये आम रेगिस्तानी मिट्टी के मुकाबले कहीं ज्यादा धूप और गर्मी सोखते हैं. जब एक साथ हजारों सोलर पैनल भारी मात्रा में गर्मी सोखते हैं, तो उनके ठीक ऊपर की हवा बहुत गर्म हो जाती है. गर्म हवा हल्की होकर तेजी से ऊपर की तरफ उठने लगती है. यूएई के रेगिस्तानों में गर्मियों के दिनों में समुद्र की ओर से नमी वाली हवाएं अंदरूनी इलाकों में आती हैं. जब यह नमी वाली हवा सोलर प्लांट के ऊपर उठने वाली गर्म हवा से टकराती है, तो उसे ऊपर उठने में भी सहायता मिलती है. इससे बादल बनते हैं और गरज के साथ बारिश होने की संभावना कई गुना तक बढ़ जाती है.
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए 10 किलोमीटर से लेकर 50 किलोमीटर तक के कृत्रिम सोलर काले क्षेत्रों पर रिसर्च किया. रिसर्च में सामने आया कि 10 किलोमीटर वाले छोटे सोलर प्लांट से मौसम पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा. लेकिन जब इस दायरे को 20 किलोमीटर या उससे बड़ा किया गया, हवा के रुख में बदलाव देखने को मिला, साथ ही बारिश की गतिविधियों में भी बढ़ोतरी दिखाई दी. जितना बड़ा सोलर प्लांट होगा, बारिश होने की संभावना उतनी ही ज्यादा बढ़ जाती है.
यूएई कई सालों से पानी की कमी का सामना कर रहा है और इसके लिए वह क्लाउड सीडिंग यानी आर्टिफिशियल बारिश और समुद्र के पानी को साफ करने जैसी तकनीकों पर अरबों डॉलर खर्च करता है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर यह थ्योरी सच साबित होती है, तो इन विशाल सोलर प्लांट्स की वजह से अनुकूल मौसम में लाखों क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी बारिश के रूप में मिल सकता है. यानी एक ही तीर से दो निशाने एक तरफ सस्ती बिजली मिलेगी और दूसरी तरफ बारिश भी होगी.
यूएई में वैज्ञानिकों ने समुद्री हवाओं की नमी का इस्तेमाल किया था. भारत के मामले में यह स्थिति और भी अच्छी है. भारत के थार रेगिस्तान के ठीक नीचे अरब सागर है, और गर्मियों के दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून की नमी से भरी हवाएं गुजरात और राजस्थान के ऊपर से होकर जाती हैं. कई बार नमी होने के बाद हवा को ऊपर उठने के लिए जरूरी मदद नहीं मिलती है, इससे थार के कुछ इलाकों में बादल का निर्माण नहीं हो पाता है.
अगर वहां विशाल सोलर पावर प्लांट लगा दिए जाएंगे, तो वे इस मानसूनी नमी को तेजी से ऊपर आसमान की तरफ धकेलेंगे, जिससे राजस्थान के सूखे इलाकों में अच्छी बारिस की संभावना बढ़ सकती है.
