जब दूध में जिंदा मेंढक डाल देते थे लोग, बिना फ्रिज कई दिनों तक रहता था ताजा !
आज जब हर घर में फ्रिज है, तब कल्पना करना भी मुश्किल है कि जब ये नहीं था, तब लोग दूध को कई दिनों तक फ्रेश कैसे रखते थे? एक प्रचलित स्टोरी के मुताबिक़, उस समय लोग बिना फ्रिज के दूध को कई दिनों तक ताजा रखने के लिए जिंदा मेंढक का इस्तेमाल करते थे. रूस और फिनलैंड के ग्रामीण इलाकों में यह प्रथा सदियों से चली आ रही थी. लोग दूध के बर्तन में एक जिंदा ब्राउन फ्रॉग (Rana temporaria) डाल देते थे और दूध खराब नहीं होता था. यह कोई अंधविश्वास या जादू-टोना नहीं था, बल्कि इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण था. 2012 में मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इस प्रथा का अध्ययन किया और फिर चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. उन्होंने पाया कि इस मेंढक की त्वचा से विशेष प्रकार के पेप्टाइड्स (छोटे प्रोटीन) निकलते हैं जो बैक्टीरिया और फंगस को मारने में बेहद प्रभावी होते हैं. इस वजह से ही दूध फ्रेश रहता था.
मेंढक के ये एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड्स दूध में मौजूद बैक्टीरिया को बढ़ने से रोक देते थे, जिससे दूध जल्दी खट्टा नहीं होता था. वैज्ञानिकों ने इस मेंढक की त्वचा से 76 से ज्यादा नए पेप्टाइड्स की पहचान की, जिनमें कई ऐसे थे जो स्टेफिलोकोकस और सैल्मोनेला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया से लड़ने में सक्षम थे. पुराने समय में जब रेफ्रिजरेशन की सुविधा नहीं थी, तब यह तरीका आम लोगों के लिए वरदान साबित होता था. दूध खराब होने से बच जाता था और परिवार कई दिनों तक ताजा दूध का इस्तेमाल कर पाता था. मेंढक को बाद में निकाल लिया जाता था और उसे नुकसान नहीं पहुंचाया जाता था.आज के दौर में यह प्रथा अजीब लगती है, लेकिन यह प्रकृति से मिले ज्ञान का बेहतरीन उदाहरण है.
वैज्ञानिक अब इन पेप्टाइड्स से नए एंटीबायोटिक्स बनाने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर उन बैक्टीरिया के खिलाफ जो मौजूदा दवाओं के प्रति रेसिस्टेंट हो चुके हैं. रूस के अलावा फिनलैंड और कुछ अन्य यूरोपीय इलाकों में भी यह तरीका प्रचलित था. लोग मेंढक को दूध के बर्तन में डालकर रख देते थे. मेंढक दूध में तैरता रहता और अपनी त्वचा से लगातार पेप्टाइड्स छोड़ता रहता था. इससे दूध का पीएच बैलेंस बना रहता और बैक्टीरियल ग्रोथ रुक जाती थी. आधुनिक विज्ञान ने इस पुरानी लोक परंपरा को सही साबित किया है. अमेरिकन केमिकल सोसाइटी और अन्य जर्नल्स में इस पर रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इन पेप्टाइड्स का इस्तेमाल भविष्य में फूड प्रिजर्वेशन और मेडिसिन दोनों क्षेत्रों में हो सकता है. हालांकि आजकल किसी को भी सलाह नहीं दी जाती कि दूध में मेंढक डालें. स्वच्छता और स्वास्थ्य की दृष्टि से यह जोखिम भरा हो सकता है.
