गोले में छिपा है भविष्य के इंसानों के लिए एक सीक्रेट मैसेज
करीब 50 साल से एक खास सैटेलाइट लगातार पृथ्वी के चारों ओर घूम रहा है. इसका नाम LAGEOS है, जिसे NASA ने 1976 में लॉन्च किया था. करीब 900 पाउंड वजनी यह सैटेलाइट पीतल और एल्युमिनियम से बना एक गोलाकार ढांचा है, जो देखने में किसी “डिस्को बॉल” जैसा लगता है. सबसे खास बात यह है कि यह सैटेलाइट बाकी सैटेलाइट्स की तरह बैटरी या इलेक्ट्रॉनिक सेंसर पर निर्भर नहीं करता. इसके बावजूद यह आज भी वैज्ञानिकों के लिए बेहद अहम डेटा उपलब्ध कराता है और धरती से जुड़े रिसर्च में बड़ी भूमिका निभा रहा है. LAGEOS दरअसल एक बड़े शीशे की तरह काम करता है. इसका आकार करीब 60 सेंटीमीटर है और इसमें खास तरह के रिफ्लेक्टिव मिरर लगे हैं. जब धरती से लेजर बीम इस सैटेलाइट पर भेजी जाती है, तो यह उसे वापस उसी जगह लौटा देता है. वैज्ञानिक इस लेजर के आने-जाने में लगे समय को मापते हैं और इससे यह पता लगाते हैं कि धरती पर कोई खास स्थान बिल्कुल कहां स्थित है. इस तकनीक ने यह साबित किया कि पृथ्वी की सतह एक ठोस टुकड़ा नहीं है, बल्कि कई टेक्टोनिक प्लेट्स से बनी है जो लगातार हिलती-डुलती रहती हैं. LAGEOS एक बहुत ही स्थिर कक्षा (ऑर्बिट) में घूमता है, जिससे इसकी मूवमेंट को आसानी से ट्रैक किया जा सकता है. वैज्ञानिक इसके जरिए धरती के अंदर और सतह पर हो रहे बदलावों को समझते हैं. यह सैटेलाइट बर्फ के पिघलने से धरती के मास में होने वाले बदलाव, पृथ्वी के घूर्णन (रोटेशन) में हल्के बदलाव और पोलर मोशन जैसी चीजों को मापने में मदद करता है. यह सारी जानकारी International Terrestrial Reference Frame को तय करने में काम आती है, जो GPS और नेविगेशन सिस्टम की नींव है.
LAGEOS को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह बेहद लंबे समय तक काम कर सके. इसमें 426 खास रेट्रोरिफ्लेक्टर लगे हैं, जो रोशनी को उसी दिशा में वापस भेजते हैं जहां से वह आई हो. चूंकि इसमें कोई इलेक्ट्रॉनिक पार्ट नहीं है जो खराब हो सके और यह पृथ्वी से करीब 6000 किलोमीटर ऊपर घूमता है, इसलिए यह वायुमंडलीय घर्षण (एटमॉस्फेरिक ड्रैग) से भी बचा रहता है. NASA के मुताबिक, यह सैटेलाइट अगले 84 लाख साल तक धरती के वायुमंडल में वापस नहीं आएगा.
इस सैटेलाइट को एक तरह का टाइम कैप्सूल भी माना जाता है. NASA ने इसके अंदर एक स्टेनलेस स्टील की प्लेट लगाई है, जिसमें पृथ्वी के तीन नक्शे दिए गए हैं. पहला नक्शा 26.8 करोड़ साल पहले का है, जब सभी महाद्वीप एक साथ ‘पैंजिया’ नाम के सुपरकॉन्टिनेंट का हिस्सा थे. दूसरा नक्शा 1976 का है, जब यह सैटेलाइट लॉन्च हुआ था. तीसरा नक्शा भविष्य का है, जिसमें दिखाया गया है कि 84 लाख साल बाद पृथ्वी कैसी दिख सकती है.
