सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, सड़क हादसे के पीड़ितों को मिली बड़ी राहत

सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। अदालत ने कहा है कि अब फिलहाल कोई भी मोटर एक्सीडेंट क्लेम याचिका सिर्फ देर से दायर होने के कारण खारिज नहीं की जाएगी। साल 2019 में मोटर व्हीकल एक्ट में संशोधन किया गया था। इसमें सेक्शन 166(3) जोड़ा गया था, जिसके तहत कहा गया था कि दुर्घटना के छह महीने के भीतर ही मुआवज़े की याचिका दायर करनी होगी। इसी प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह अंतरिम आदेश दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने कहा कि देशभर में इस कानून को लेकर कई याचिकाएं लंबित हैं, इसलिए इन सभी की सुनवाई जल्द की जाए। तब तक किसी भी मामले को समय सीमा के आधार पर खारिज न किया जाए। कोर्ट ने सभी पक्षों से दो हफ्ते के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। याचिका दायर करने वाले वकील का कहना है कि छह महीने की सीमा तय करना अनुचित और अन्यायपूर्ण है। उनका तर्क है कि मोटर व्हीकल एक्ट एक कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य सड़क हादसे के पीड़ितों और उनके परिवारों को मदद देना है, न कि उन्हें मुआवज़े से वंचित करना।

सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम फैसला दिया है। अदालत ने कहा है कि अब से मुआवज़ा तय करने में “स्प्लिट मल्टीप्लायर” (Split Multiplier) पद्धति का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि मुआवज़ा मृतक की मृत्यु के समय की आय के आधार पर ही तय होगा — न कि भविष्य में उसकी कमाई घटने की संभावना के आधार पर। यह फैसला केरल हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए दिया गया है, जिसमें “स्प्लिट मल्टीप्लायर” लागू कर मुआवज़ा घटाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति या उम्र बढ़ना कोई ऐसा कारण नहीं है, जिससे मुआवज़ा कम किया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि इस फैसले की प्रति देश के सभी हाईकोर्ट्स और मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल्स (MACTs) को भेजी जाए, ताकि हर जगह इसका पालन सुनिश्चित किया जा सके।

जब सड़क हादसे में कोई घायल या मृत होता है, तो अदालत यह तय करती है कि उसे (या उसके परिवार को) कितनी क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। इसके लिए एक फ़ॉर्मूला होता है, जिसे कहते हैं “Multiplier Method”।

इसमें तीन बातें देखी जाती हैं:

पीड़ित की सालाना आय
उसकी उम्र

वह भविष्य में कितने साल तक कमा सकता था

अगर किसी व्यक्ति की सालाना आय ₹3 लाख है और उसकी उम्र 30 साल है, तो अदालत यह मान सकती है कि वह औसतन 17 साल और कमा सकता था। तो ₹3,00,000 × 17 = ₹51,00,000 -बेसिक मुआवज़ा हुआ।

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