ISRO ढूंढ रहा ‘बाहुबली का बॉस’, रॉकेट्स को स्पेस में भेजने के लिए बनाया मास्टरप्लान
दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों में मुकाम बना चुका भारत अब सैटेलाइट लॉन्चिंग में ग्लोबल लीडर बनने की कोशिश में है. इसके लिए वह अपने स्पेस लॉन्चिंग सेंटरों की क्षमता बढ़ाने और नए लॉन्चिंग सेंटर खोलने के मिशन में लगा है. तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में बन रहा नया लॉन्च सेंटर भी इन्हीं में से एक है. यह नया लॉन्च कॉम्प्लेक्स खास तौर पर छोटे रॉकेट (SSLV) लॉन्च करने के लिए इस्तेमाल होगा. रिपोर्ट के मुताबिक, कुलसेकरपट्टिनम के लिए ISRO एक खास तरह की रेल लाइन लगाने की तैयारी कर रहा है. इसके लिए सतीश धवन स्पेस सेंटर ने टेंडर निकाला है. यह रेल लाइन लगभग 1700 मीटर लंबी होगी. इस लाइन का मुख्य काम पूरी तरह तैयार हाल वाले रॉकेट को असेंबली बिल्डिंग से लॉन्च पैड तक ले जाना होगा. जिसकी दूरी करीब 740 मीटर है.
यह कोई सामान्य पैसेंजर ट्रेन या मालगाड़ी नहीं होगी बल्कि खास तकनीक से बनी रेल होगी. इस स्पेशल ट्रेन का इस्तेमाल मोबाइल लॉन्च स्ट्रक्चर (MLS) के रूप में होगा. जिस पर छोटे सैटेलाइट ले जाने वाले रॉकेट रखे होंगे. इन सैटेलाइटों समेत पूरे सिस्टम का वजन 570 टन तक हो सकता है. यह वजन इतना ज्यादा होगा कि ट्रेन के हर पहिए को करीब 100 टन भार तक वजन उठाना पड़ सकता है. इसलिए इतने वजन को वहन करने के लिए रेल में बेहद मजबूत स्टील और लोहे का इस्तेमाल होगा.
इसरो अधिकारियों का कहना है कि यह ट्रेन तो खास होगी ही, इसकी लाइन भी सामान्य नहीं होगी. इस रेल की ऊंचाई में 1 मिलीमीटर से ज़्यादा का फर्क नहीं होगा. जिससे रॉकेट लाते- ले जाते समय जरा-सी भी ऊंच-नीच न हो पाए. इस रेल लाइन में एक घुमावदार हिस्सा और अलग-अलग गेज की पटरियां होंगी. जिससे जरूरत होने पर लॉन्च स्ट्रक्चर को साइड में पार्क किया जा सके.
इस सिस्टम की एक खास बात यह होगी कि जब ट्रैक बदला जाएगा, तो लॉन्च स्ट्रक्चर को कुछ समय के लिए जमीन पर टिकाया जाएगा. इसके बाद पहियों को उठाकर हाथ से सही दिशा में घुमाया जाएगा. इसके बाद उसे फिर से ट्रैक पर रखकर रवाना कर दिया जाएगा. सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए 986 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट रखा है और इसे पूरा करने के लिए 2026-27 का लक्ष्य रखा है. इसरो के तहत आने वाले सतीश धवन स्पेस सेंटर ने अपने टेंडर नोटिस में काम पूरा करने के लिए 29 हफ्तों का समय रखा है. अधिकारियों का कहना है कि तय अवधि में काम पूरा न होने की हालत में चयनित कंपनी पर जुर्माना लगाया जाएगा.
इसरो वैज्ञानिकों के मुताबिक, श्रीहरिकोटा से 300 किलो तक का सैटेलाइट पोलर ऑर्बिट में ले जाना बड़ा मुश्किल होता है. लेकिन कुलसेकरपट्टिनम में नया लॉन्चिंग सेंटर बन जाने से यह समस्या खत्म हो जाएगी. इसके बाद वहां से पोलर ऑर्बिट में सैटेलाइट भेजना ज्यादा आसान और असरदार हो जाएगा. इस सेंटर के तैयार होने से इसरो के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियां भी वहां से अपने छोटे रॉकेट लॉन्च कर सकेंगी.
