भारत में यहां मिली 2,000 साल पुरानी भूलभुलैया, बनावट देखकर एक्सपर्ट्स भी चौंके
महाराष्ट्र के घास के मैदान में एक ऐसी रहस्यमय गोलाकार पत्थर की संरचना मिली है, जो न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के पुरातत्विदों और इतिहासकारों को हैरान कर दिया है. राज्य के सोलापुर जिले के बोरामानी घास के मैदानों में छिपी यह संरचना एक तरीके से भारत की सबसे बड़ी गोलाकार भूलभुलैया मानी जा रही है. वहीं, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह 2000 साल से भी पुरानी हो सकती है. दरअसल, हाल में ही हुई यह खोज न केवल अपने विशाल आकार के कारण महत्वपूर्ण है, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे भारत को रोमन साम्राज्य से जोड़ने वाले प्राचीन व्यापार मार्गों के बारे में जानकारी मिल सकती है.
बता दें कि महाराष्ट्र में इससे पहले भी रोमन काल से जुड़े अवशेष मिल चुके हैं, जिसमें कांस्य दर्पण और ग्रीको-रोमन समुद्री देवता पोजीडॉन की मूर्ति शामिल है. जानकारी के अनुसार, इस संरचना का व्यास लगभग 50 फीट है. यह 15 गोलाकार चक्कर पत्थरों से बने है. खास बात है कि भारत में अभी तक मिली सबसे बड़ी गोलाकार लेबिरिंथ तमिलनाडु में मिली है. एक रिपोर्ट के अनुसार, खोज पर पुणे के डेक्कन कॉलेज के पुरातत्वविद् सचिन पाटिल ने कहा कि यह संरचना प्राचीन व्यापारियों के लिए नेविगेशनल मार्कर का नाम कर सकती थी. रोमन व्यापारी दक्कन क्षेत्र में सक्रिय थे. वे सोना, शराब, कांच के सामान देकर भारतीय मसाले, रेशम मनके और इंडिगो रंग खरीदते थे.एक्सपर्ट्स इस संचरचना को महाभारत के प्रसिद्ध चक्रव्यूह से भी जोड़ रहे हैं. महाभारत में चक्रव्यूह एक जटिल वृत्ताकार सैन्य संरचना को संदर्भित करता है जिसे शत्रुओं को घूर्णनशील रक्षात्मक परतों के भीतर फंसाने के लिए बनाया गया है. यही कारण है कि शोधकर्ताओं का कहना है कि बोरामानी भूलभुलैया इन गोलाकार आकृतियों से दृश्य रूप से मिलती-जुलती है. वहीं, कई भारतीय परंपराओं में भूल-भुलैया जैसी आकृतियों को आध्यात्मिकता, ध्यान, उर्वरता और ब्रहांडीय प्रतीकवाद से जोड़ा जाता है.
सबसे हैरान करने वाली बात है कि इस प्राचीन संरचना की खोज सबसे पहले पुरातत्वविदों ने नहीं की थी. रिपोर्ट्स के अनुसार, बोरामानी घास के मैदानों में वन्यजीव सर्वेक्षण करते समय एक स्थायीन संरक्षण समूह के सदस्य ने पत्थरों के इस अनोखे पैटर्न को देखा था. बाद में शोधकर्ताओं ने पुष्टि करते हुए बताया कि यह भूलभुलैया संभवतः प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण था. पुरातत्वविदों का कहना है कि पत्थरों की सावधानीपूर्वक व्यवस्था और स्थल की जीर्ण-शीर्ण स्थिति से स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह सातवाहन काल की है.
