महाराष्ट्र में मुस्लिमों के 5% आरक्षण का आदेश रद्द, 2014 में कांग्रेस अध्यादेश लाई थी

महाराष्ट्र सरकार के सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट ने मंगलवार को एक सरकारी रेजोल्यूशन (GR) जारी किया। इसके जरिए सरकार ने अपने 10 साल पुराने उस सरकारी आदेश को कैंसिल कर दिया। जिसमें मुस्लिम कम्युनिटी को एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और सरकारी और सेमी-गवर्नमेंट नौकरियों में 5% रिजर्वेशन देने की बात कही गई थी। हालांकि पिछले 10 सालों से यह आदेश इनवैलिड रहा है क्योंकि 2014 में कांग्रेस सरकार की तरफ से लाया गया अध्यादेश तय समय (6 हफ्ते) में विधानसभा से पास नहीं कराया जा सका, जिससे यह खुद ही इनवैलिड हो गया था। जुलाई 2014 में कांग्रेस-एनसीपी की गठबंधन की सरकार थी। अक्टूबर 2014 में सरकार बदल गई। विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा-शिवसेना सरकार बनी। नई सरकार ने नौकरी वाले मुस्लिम आरक्षण को आगे नहीं बढ़ाया।

कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देने से पहले पांच सालों (2008–2013) तक रिसर्च की। सरकार ने सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति पर कई कमेटियां/रिपोर्ट्स बनवाईं। नतीजा यह निकला कि मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्ग पिछड़े हैं, इसलिए आरक्षण की सिफारिश की गई।

कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार में तत्कालीन सीएम पृथ्वीराज चव्हाण ने मुस्लिमों को शिक्षा और सरकारी नौकरी में 5% आरक्षण देने का ऐलान किया। इसे अध्यादेश/सरकारी आदेश के जरिए लागू करने की कोशिश हुई। यह फैसला विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए राजनीतिक विवाद भी हुआ।

अगस्त से सितंबर के बीच नियम को लागू करने की शुरुआत हुई। कुछ शैक्षणिक संस्थानों में एडमिशन के लिए 5% कोटा लागू होना शुरू हुआ। नौकरी वाला हिस्सा भी नोटिफिकेशन में था, पर जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हो पाया।

मुस्लिमों को 5% आरक्षण देने के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी गई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश जारी किया। शिक्षा में 5% आरक्षण जारी रखने की अनुमति मिली। वहीं सरकारी नौकरियों में 5% आरक्षण पर रोक लगा दी गई। कोर्ट ने कहा कि नौकरी वाले आरक्षण के लिए पर्याप्त ठोस डेटा नहीं दिखाया गया।

2015 से 2018 के बीच अदालतों में केस चलता रहा। राज्य सरकार ने अलग मुस्लिम कोटा की जगह OBC/SEBC श्रेणी के अंदर लाभ देने की बात कही। हालांकि अलग 5% मुस्लिम कोटा पर कोई नया मजबूत कानून नहीं आया। नीति लागू नहीं हुई।

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