मुरादाबाद में 3 हेक्टेयर मदरसा जमीन पर MDA का कब्जा, गेट पर चला बुलडोजर
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के कड़े रुख के बीच मुरादाबाद विकास प्राधिकरण (MDA) ने एक बड़ी कार्यवाही को अंजाम दिया है. करीब ढाई दशक से चले आ रहे कानूनी विवाद के अंत के बाद, मझोला थाना क्षेत्र के मंगूपुरा स्थित ‘मदरसा जामिया अरबिया हयातुल उलूम’ की विवादित जमीन पर एमडीए ने अपना कब्जा वापस ले लिया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा मदरसे की याचिका को ‘न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग’ बताते हुए खारिज करने के तुरंत बाद प्रशासन ने बुलडोजर के साथ मौके पर पहुंचकर घेराबंदी शुरू कर दी है. करीब 3 हेक्टेयर की इस कीमती जमीन को अब ‘नया मुरादाबाद’ योजना का हिस्सा बनाया जाएगा. बुधवार को मुरादाबाद विकास प्राधिकरण की टीम भारी पुलिस बल के साथ मझोला थाना क्षेत्र के मंगूपुरा गांव पहुंची. यहां मदरसा जामिया अरबिया हयातुल उलूम के कब्जे वाली जमीन पर कार्यवाही शुरू की गई. प्राधिकरण ने न केवल मदरसे के गेट बंद करने की प्रक्रिया शुरू की, बल्कि बुलडोजर की मदद से जमीन को खाली कराकर वहां अपनी दीवार बनाने का काम भी त्वरित गति से प्रारंभ कर दिया है.
एमडीए के सचिव पंकज वर्मा ने बताया कि यह जमीन प्राधिकरण की ‘नया मुरादाबाद आवासीय योजना’ के तहत अधिग्रहित 175 हेक्टेयर भूमि का हिस्सा है. गाटा संख्या 498 और 499 की इस लगभग 3 हेक्टेयर जमीन का कब्जा वर्ष 2000 में ही कागजों पर लिया जा चुका था, लेकिन कानूनी दांव-पेच के कारण भौतिक कब्जे में अड़चनें आ रही थीं.
इस पूरे मामले की जड़ें 1980 के दशक तक जाती हैं, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय इस मदरसे की नींव रखी गई थी. साल 2000 में जब मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने क्षेत्रीय विकास के लिए जमीन का अधिग्रहण शुरू किया, तभी से यह मदरसा विवादों के घेरे में आ गया था. मदरसा कमेटी ने इस अधिग्रहण को चुनौती देते हुए पहली बार 2004 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
2005 में उनकी याचिका खारिज हुई, जिसके बाद मामला शासन और एमडीए बोर्ड तक गया. 2007 में बोर्ड ने भी मदरसा कमेटी के दावों को निरस्त कर दिया. इसके बाद कमेटी बार-बार अदालतों के चक्कर काटती रही, लेकिन अंततः 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे कानून सम्मत मानते हुए एमडीए के पक्ष में फैसला सुनाया.
न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने अपने फैसले में याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही बहुत पहले ही पूरी हो चुकी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार जब जमीन का कब्जा लेकर वह राज्य में निहित हो जाती है, तो उसे अधिग्रहण से मुक्त नहीं किया जा सकता.
अदालत ने पाया कि याची ने एक ही मामले को लेकर पांच बार याचिकाएं दाखिल कीं, जो न्यायिक समय की बर्बादी और प्रक्रिया का दुरुपयोग है. कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहर लाल’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि 2013 के नए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 24(2) का सहारा लेकर पुराने बंद हो चुके मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता
एमडीए के अनुसार, इस अधिग्रहित भूमि पर पहले ही एक बड़ी आवासीय कॉलोनी विकसित की जा चुकी है और कई लोगों को भूखंड आवंटित किए जा चुके हैं. मदरसे के कब्जे वाली यह 3 हेक्टेयर जमीन योजना के बीच में एक बड़ी बाधा बनी हुई थी. अब कब्जा मिलने के बाद यहां व्यावसायिक और आवासीय विकास कार्यों को गति दी जाएगी.
कार्यवाही के दौरान एमडीए अधिकारियों ने साफ किया कि मुआवजे की राशि पहले ही सरकारी खजाने में जमा कराई जा चुकी है, इसलिए कब्जे का विरोध करना अब वैधानिक रूप से गलत है. मौके पर किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा.
