मौत की सजा का नहीं बदलेगा तरीका… सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाने वाले कैदियों को फांसी देने के बजाय कोई दूसरा तरीका अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। याचिका में कहा गया था कि फांसी देना सजा-ए-मौत देने का एक दर्दनाक तरीका है। इसके साथ ही, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस रिट याचिका को खारिज करने का मतलब यह नहीं है कि भविष्य में इस मामले की संवैधानिक समीक्षा नहीं हो सकती। अगर कोई ठोस मेडिकल या वैज्ञानिक सबूत सामने आते हैं जिनसे इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने की जरूरत पता चलती है, तो समीक्षा की जा सकती है।
हालांकि, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि अगर केंद्र सरकार मौत की सजा देने के तरीके की व्यापक समीक्षा करना चाहती है और इसके लिए कोई दूसरा तरीका अपनाना चाहती है, तो यह फैसला उसके रास्ते में नहीं आएगा।
इसके साथ ही कोर्ट ने 22 जनवरी, 2026 को मौत की सजा देने के लिए कोई दूसरा और ज्यादा सम्मानजनक तरीका अपनाने की मांग वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर पीआईएल में मौत की सजा पाए कैदी को फांसी देकर मारने के मौजूदा तरीके को खत्म करने की मांग की गई थी, क्योंकि इसमें लंबे समय तक दर्द और तकलीफ होती है। इसमें मांग की गई थी कि फांसी की जगह जानलेवा इंजेक्शन गोली मारने, बिजली का झटका देने या गैस चैंबर जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, जिनसे कैदी की मौत कुछ ही मिनटों में हो सके।
याचिका में कहा गया है कि फांसी की पूरी प्रक्रिया में कैदी को मृत घोषित करने में 40 मिनट से अधिक समय लगता है। वहीं, गोली मारने की प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं। नसों में दिए जाने वाले घातक इंजेक्शन के मामले में, यह प्रक्रिया 5 मिनट में पूरी हो जाती है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि धारा 354(5) सीआरपीसी के तहत परिकल्पित निष्पादन (जब तक व्यक्ति की मृत्यु न हो जाए तब तक गर्दन से लटकाना) न केवल बर्बर, अमानवीय और क्रूर है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ईसीओएसओसी) की ओर से अपनाए गए प्रस्तावों के भी विरुद्ध है।
