10 रुपये की गड़बड़ी पर रेलवे कर्मचारी की छिनी नौकरी, 24 साल बाद MP हाईकोर्ट से मिला न्याय, बर्खास्तगी रद्द

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने 10 रुपये की गड़बड़ी के मामले में बर्खास्त रेलवे कर्मचारी नारायण नायर की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया। दरअसल, चार जनवरी, 2002 को नायर नरसिंहपुर जिले के श्रीधाम रेलवे स्टेशन के टिकट काउंटर पर ड्यूटी में थे, तभी अचानक विजिलेंस टीम पहुंची और आरोप लगाया कि नायर ने टिकट खरीदने पर 31 रुपये के स्थान पर 21 रुपये ही लौटाए हैं। उन्होंने 10 रुपये बचा लिए। नायर बार-बार कहते रहे भीड़ थी, गलती हो सकती है। इसके बावजूद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। विजिलेंस टीम ने उनके पास 450 रुपये अतिरिक्त और टिकट रोल मिलने का भी आरोप लगाया। नायर ने इस पर कहा कि रुपये बीमार पत्नी की दवा के लिए रखे थे, जबकि बंडल नीचे पड़ा हुआ था उसकी जानकारी नहीं थी। हालांकि, उनकी सफाई काम नहीं आई।

करीब 24 साल चली सुनवाई में जो तथ्य सामने आए, वह प्रक्रिया की विफलता की हकीकत थी। हाई कोर्ट ने पाया कि 10 रुपये की गड़बड़ी के आरोप के समर्थन में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। सिर्फ यात्री का बयान था, जो खुद विजिलेंस टीम का हिस्सा था। अन्य यात्री ने कभी शिकायत नहीं की, चौंकाने वाली बात यह कि जांच अधिकारी ही अभियोजन पक्ष की भूमिका भी निभा रहा था। नियम तोड़े गए। प्रक्रियाएं नजरअंदाज की गईं।

गड़बड़ी सिर्फ आरोपों में नहीं बल्कि आंकड़ों में भी थी। पहले कहा गया कि 778 रुपये अतिरिक्त मिले। जांच में यही रकम घटकर सिर्फ सात रुपये रह गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप संभावनाओं के आधार पर साबित नहीं होते। ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए हाई कोर्ट ने रेलवे की याचिका निरस्त कर दी। साथ ही कहा कि अगर कोई छोटी चूक थी, तो उसके लिए नौकरी से बर्खास्त करना कठोर और असंगत सजा थी।