सहारा रेगिस्‍तान में कभी बहती थीं नदियां, रहते थे हिप्‍पो

सहारा रेगिस्तान का जिक्र होते ही दिमाग में बेहिसाब रेत, झुलसा देने वाली गर्मी और धरती की सबसे मुश्किल जगहों में से एक का नजारा दिखता है। लेकिन भू-विज्ञान कुछ और ही कहानी बताता है। रेत के टीलों के नीचे पुरानी नदियों, विशाल झीलों और ऐसे इकोसिस्टम के निशान दबे हैं जहां कभी दरियाई घोड़े, मगरमच्छ और फलते-फूलते इंसानी समुदाय रहा करते थे।

वैज्ञानिकों ने अब पता लगा लिया है कि ये बड़े बदलाव अचानक नहीं हुए बल्कि ये कुदरती जलवायु चक्र का हिस्सा थे जिसने लाखों सालों से उत्तरी अफ्रीका का रूप बदला है। नई रिसर्च और सैटेलाइट से मिली जानकारियों और समुद्र की तलछट में सुरक्षित सबूतों से पता चल रहा है कि दुनिया का सबसे बड़ा गर्म रेगिस्तान बार-बार हरा-भरा क्यों हुआ, वे उपजाऊ इलाके हजारों सालों तक कैसे बने रहे और अगली बार ‘ग्रीन सहारा’ कब आएगा।

वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि हर 20 हजार साल में सहारा रेगिस्तान बदल जाता है। अलग-अलग रिपोर्ट्स और MIT News की रिपोर्ट से पता चलता है कि सहारा में ज्यादा बारिश वाले दौर अक्सर लगभग हर 20,000 साल में लौटते हैं। यह आंकड़ा पृथ्वी की एक लंबे समय तक चलने वाली गति से आता है जिसे ‘एक्सियल प्रीसेशन’ कहा जाता है। यह ग्रह की घूमने वाली धुरी की दिशा में धीरे-धीरे होने वाला बदलाव है।

जैसे-जैसे पृथ्वी की स्थिति धीरे-धीरे बदलती है सूरज के चारों ओर ग्रह की स्थिति के हिसाब से मौसम का समय भी बदलता है। कुछ खास समय पर उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों के दौरान तेज धूप मिलती है क्योंकि ये तब होती हैं जब पृथ्वी सूरज के थोड़ी ज्यादा करीब होती है। उस अतिरिक्त गर्मी का असर सिर्फ तापमान तक ही सीमित नहीं रहता। उत्तरी अफ्रीका में जमीन के गर्म होने से आस-पास के महासागरों के मुकाबले ज्यादा बड़ा अंतर पैदा होता है।

इससे अफ्रीकी गर्मियों का मानसून मजबूत होता है जिससे नमी वाली हवा आज की तुलना में कहीं ज्यादा उत्तर तक पहुंच पाती है। बारिश उन इलाकों तक पहुंचती है जो अभी लगभग पूरी तरह सूखे हैं जिससे सहारा के बड़े हिस्सों में पेड़-पौधे, नदियां और झीलें बनने लगती हैं। बारिश में शुरुआती बढ़ोतरी पूरी कहानी का बस एक हिस्सा है। जब पौधे फैलने लगते हैं तो वे अपने आस-पास के माहौल को बदलने लगते हैं।

रेगिस्तान की हल्की रेत की तुलना में पेड़-पौधे जमीन को गहरा रंग देते हैं जिससे सतह सूरज की रोशनी को वापस भेजने के बजाय उसे ज्यादा सोख पाती है। पौधों की परत मिट्टी में नमी बनाए रखने में भी मदद करती है और हवा में धूल के कण कम पहुंचते हैं। झीलें और आर्द्रभूमि वाष्पीकरण के जरिए और नमी जोड़ते हैं जिससे ऐसे हालात बनते हैं जिनमें और ज्यादा बारिश हो सकती है और फिर नई झीलों का निर्माण होने लगता है।