रिपोर्ट-हूतियों को हमला न करने के बदले पैसे देगा सऊदी, रक्षा मंत्री 1 अरब डॉलर लेकर तेहरान पहुंचे

सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच पिछले 3 महीने से जंग चल रही है। हूती विद्रोहियों ने सऊदी के कई तेल ठिकानों और एयरपोर्ट्स पर हमले किए हैं। अब इसे खत्म करने के लिए सऊदी ने हूती विद्रोहियों को पैसे देने की पेशकश की है। इजराइली अखबार हायोम के मुताबिक सऊदी हूती विद्रोहियों को 1 अरब डॉलर (95 अरब रुपए) देने को राजी हो गया है।

ईरान इस समझौते के लिए मध्यस्थ बना है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान इस सिलसिले में बातचीत के लिए सोमवार को तेहरान पहुंचे थे। वे जिस प्लेन से तेहरान गए, उसमें पैसे भी ले गए थे। इस बातचीत में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और तुर्किये की खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन और ईरान की ओर से राष्ट्रपति मसूद पजशकियान भी शामिल हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब का कहना है कि वह सैन्य दबाव में आकर कोई नया सीजफायर समझौता नहीं करेगा। सऊदी चाहता है कि हूती पहले उन इलाकों को लौटाएं, जिन पर उन्होंने यमन की सरकार से कब्जा किया है। इस सरकार को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है।

हूतियों के हमलों से सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल ठिकानों को नुकसान पहुंचा है। इससे देश की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है। दूसरी ओर, बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास भी हूतियों के कब्जे की वजह से सऊदी का तेल निर्यात प्रभावित हुआ है।

इजराइली मीडिया के मुताबिक, सऊदी अरब और हूतियों के बीच विवाद की एक वजह तीन साल पहले हुई सहमति को लागू न करना भी है।

उस समझौते के तहत सऊदी अरब को हूतियों के नियंत्रण वाले इलाकों में सरकारी कर्मचारियों की सैलरी देने और आम लोगों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं दोबारा बनाने के लिए आर्थिक मदद देनी थी।

इसके बदले हूती विद्रोहियों से सीजफायर बनाए रखने और सऊदी अरब पर हमले रोकने की उम्मीद थी। लेकिन हाल ही में हूतियों ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब ने पुरानी सहमति का पालन नहीं किया। उन्होंने इसी आधार पर अपने हमलों को सही ठहराया है।

सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देता रहा है। इसके बावजूद वह 2015 से हूती विद्रोहियों के खिलाफ जारी लड़ाई में जीत हासिल नहीं कर पाया है।

10 साल से ज्यादा समय बाद भी हूती यमन के बड़े हिस्से पर काबिज हैं और सऊदी अरब पर ड्रोन-मिसाइल हमले करने की क्षमता रखते हैं।

इसकी एक बड़ी वजह हमले और बचाव पर होने वाला खर्च है। हूती सस्ते ड्रोन और मिसाइलों से हमला करते हैं, जबकि उन्हें रोकने के लिए सऊदी अरब को महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं।

ऐसे में हूतियों के हमलों को रोकने में सऊदी अरब का खर्च कहीं ज्यादा हो सकता है, जिससे लंबे समय तक लड़ाई जारी रखना महंगा पड़ता है। यमन का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है। ऐसे इलाकों में हूती विद्रोहियों के ठिकानों का पता लगाना और उन्हें पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होता।

हवाई हमलों से किसी ठिकाने को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन इससे पूरे इलाके पर कब्जा नहीं मिलता।

हूती लंबे समय से यमन में सक्रिय हैं और वहां उनकी मजबूत पकड़ है। उन्हें पूरी तरह हटाने के लिए सऊदी अरब को बड़ा जमीनी अभियान चलाना पड़ सकता है। इसमें सैनिकों के मारे जाने और युद्ध लंबे समय तक चलने का खतरा है।