सिरोही के इस मंदिर में मन्नत पूरी होने पर नहीं चढ़ता सोना-चांदी, भक्त चढ़ाते हैं सिर्फ मिट्टी के घोड़े
राजस्थान के सिरोही जिले में रहने वाली गरासिया जनजाति मन्नत पूरी होने पर सोने-चांदी के बजाय मिट्टी के घोड़े चढ़ाती है. आबूरोड के उपलागढ़ गांव में स्थित ‘भाखर बाबा’ के मंदिर में संतान प्राप्ति, बीमारी से मुक्ति और अच्छी खेती की मन्नतें पूरी होने पर ये घोड़े अर्पित किए जाते हैं. गुजरात के पोसीना गांव के कुम्हारों द्वारा टेराकोटा आर्ट से बनाए गए इन घोड़ों के कारण मंदिर परिसर में मिट्टी के घोड़ों का बड़ा ढेर लगा रहता है, और यहाँ आयोजित होने वाले मेले में पारंपरिक ‘घोड़ा नृत्य’ किया जाता है. आमतौर पर आपने देश के प्रसिद्ध और बड़े मंदिरों में मन्नत पूरी होने पर भक्तों द्वारा सोना, चांदी, कीमती आभूषण या भारी मात्रा में नगदी चढ़ाते हुए देखा और सुना होगा. लेकिन राजस्थान में एक ऐसी अनूठी जनजाति भी निवास करती है, जो अपनी मनोकामना पूरी होने पर किसी भी तरह के महंगे आभूषण चढ़ाने के बजाय भगवान को मिट्टी के बने खास घोड़े अर्पित करती है. जी हां, यह अनोखी और दिलचस्प परंपरा राजस्थान के सिरोही, उदयपुर और गुजरात के कुछ सीमावर्ती जिलों में रहने वाली ‘गरासिया जनजाति’ (Garasia Tribe) में पीढ़ियों से निभाई जा रही है. इस समाज के लोगों में अरावली के ऊंचे पहाड़ों की भगवान के रूप में पूजा करने का विशेष महत्व है.
सिरोही जिले के आबूरोड और पिंडवाड़ा क्षेत्रों में गरासिया जनजाति के लोग बहुतायत में रहते हैं. यहाँ आबूरोड के ‘भाखर क्षेत्र’ में, जो कि अरावली पहाड़ों की एक खूबसूरत श्रृंखला है, स्थानीय आदिवासी लोग ‘भाखर बाबा’ (भाखर बावसी) की मुख्य रूप से पूजा-अर्चना करते हैं. इनका सबसे बड़ा और मुख्य मंदिर देलदर तहसील के उपलागढ़ गांव में स्थित है. गरासिया समाज में मान्यता है कि भगवान घोड़े के रूप में ही जंगलों और पहाड़ों में निवास करते हुए इस पूरे आदिवासी समाज की हर संकट से रक्षा करते हैं. यही वजह है कि जीवन के किसी भी शुभ काम की शुरुआत करने से पहले इस समाज के लोग भाखर बाबा का आशीर्वाद जरूर लेते हैं और मन्नत पूरी होने पर केवल मिट्टी के घोड़े ही चढ़ाते हैं.
स्थानीय निवासी चतराराम गरासिया ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की. उन्होंने बताया कि उपलागढ़ के ‘भाखर बावसी’ और रणोरा की पहाड़ी पर स्थित ‘मांड बावसी’ इस पूरे क्षेत्र के सबसे बड़े आराध्य देव माने जाते हैं. भक्त यहाँ अपनी संतान प्राप्ति, गंभीर बीमारियों से मुक्ति, मवेशियों (पशुओं) की रक्षा, अच्छी बारिश और खेती में बेहतरीन पैदावार जैसी कई बड़ी मन्नतें लेकर आते हैं. जब यह मन्नत पूरी हो जाती है, तो भक्त टेराकोटा आर्ट (Terracotta Art) से बने मिट्टी के घोड़े चढ़ाते हैं, जिसके कारण इस स्थान को ‘घोड़ा बावड़ी’ भी कहा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि आस्था के प्रतीक ये विशेष घोड़े गुजरात के साबरकांठा जिले के पोसीना गांव के कुम्हार परिवारों द्वारा ही खास तौर पर तैयार किए जाते हैं.
क्षेत्र में भाखर बाबा के मुख्य धाम के अलावा कई अन्य छोटे मंदिरों पर भी भक्तों द्वारा अपनी क्षमता के अनुसार छोटे-बड़े आकार के मिट्टी के घोड़े चढ़ाए जाते हैं. इन धार्मिक स्थलों के बाहर हजारों की संख्या में मिट्टी के घोड़ों का एक विशाल ढेर लगा हुआ दिखाई देता है, जो यहाँ आने वाले भक्तों की अटूट आस्था और पूरी हुई मन्नतों की गवाही देता है. उपलागढ़ के भाखर बाबा मंदिर में हर साल एक भव्य मेले का आयोजन होता है, जिसमें राजस्थान और गुजरात से लाखों आदिवासी लोग जुटते हैं. इस मेले का सबसे बड़ा आकर्षण यहाँ के आदिवासी युवाओं द्वारा किया जाने वाला पारंपरिक ‘घोड़ा नृत्य’ है, जिसके जरिए वे अपने इष्ट देव की आराधना करते हैं.
