ऑस्ट्रेलिया से भारत लाई जायेंगी तीन पुरा-वस्तुएं, जानें इनकी खासियत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गए हैं. अब वहां से तीन अनमोल चीजें भारत लाई जा रही हैं. भारत और ऑस्टेलिया के बीच समझौते के तहत ये तीन पुरा-वस्तुएं ऑस्ट्रेलिया भारत को लौटा रहा है.
1. देवी भद्रकाली की प्रतिमा सहित धातु का त्रिशूल
यह एक अनुष्ठानिक त्रिशूल है, जिसके शीर्ष पर देवी भद्रकाली (शक्ति का उग्र स्वरूप) की प्रतिमा स्थापित है.
यह सुरक्षा, बुराई के विनाश और दैवी शक्ति का प्रतीक है तथा शैव-शाक्त परंपरा से जुड़ा हुआ है.
इसे दक्षिण भारतीय मंदिरों की धार्मिक धातु-शिल्प परंपरा के अंतर्गत पूजा-अर्चना के लिए बनाया गया था.
यह श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर, कोल्लुमंगुडी, तमिलनाडु से संबंधित है.
इस मंदिर का निर्माण 13वीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के बीच, उत्तर चोल से विजयनगर/नायक काल के दौरान हुआ था.
2. नंदी की पत्थर की प्रतिमा
यह प्रतिमा श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर, कोल्लुमंगुडी, तमिलनाडु से जुड़ी है.
यह प्रतिमा नंदी की है, जो भगवान शिव के पवित्र वृषभ (बैल) और वाहन हैं.
इसका निर्माण तमिल शैव मंदिर परंपरा के अनुसार किया गया है, जिसमें सघन अनुपात और अलंकरण की उत्कृष्ट कारीगरी दिखाई देती है.
परंपरागत रूप से इसे गर्भगृह (गरभगृह) की ओर मुख करके स्थापित किया जाता है, जो भक्ति, शक्ति और धर्म का प्रतीक है.
नंदी को सामान्यतः विश्राम मुद्रा में, अलंकृत घंटियों और मालाओं के साथ दर्शाया जाता है.
यह प्रतिमा श्री काशीविश्वनाथस्वामी मंदिर, कोल्लुमंगुडी गांव, तिरुवारूर जिला, तमिलनाडु से संबंधित है और 13वीं–16वीं शताब्दी ईस्वी की मानी जाती है.
3. षडानन कार्तिकेय (षण्मुख) की पत्थर की प्रतिमा
यह प्रतिमा कार्तिकेय (मुरुगन/षण्मुख) की है, जिन्हें छह मुखों के साथ दर्शाया गया है. यह ज्ञान, पराक्रम और दैवी संरक्षण का प्रतीक है.
सामान्यतः उन्हें बारह भुजाओं के साथ दर्शाया जाता है, जिनमें वेल (भाला) जैसे अस्त्र होते हैं और उनके साथ प्रायः मोर भी दर्शाया जाता है.
यह प्रतिमा चोल कालीन मूर्तिकला परंपरा में निर्मित है, जो उत्कृष्ट अनुपात और बारीक अलंकरण के लिए प्रसिद्ध है.
इसका मूल स्थान नागनाथस्वामी मंदिर, मनामबादी गांव, तंजावुर ज़िला, तमिलनाडु है.
इस मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभिक काल में राजेन्द्र चोल प्रथम के शासनकाल में हुआ था.
