भारत से 12000 किमी दूर तेजी से पिघल रहा दुनिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर

दुनिया का सबसे बड़ा ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहा है। इसका नाम थ्वाइट्स ग्लेशियर है। यह पिछले अनुमान से दो गुना तेजी से पिघल रहा है। इस ग्लेशियर का आकार गुजरात या कर्नाटक के बराबर है, जो भारत से 12000 किमी दूर स्थित है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि आने वाली सदी में, इसके कारण वैश्विक समुद्र स्तर में उतनी बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर न सिर्फ छोटे-छोटे द्वीपीय देशों पर पड़ेगा, बल्कि भारत को भी बड़ा खतरा होगा। भारत के कई तटीय शहरों के निचले इलाके समुद्र में डूब सकते हैं। इसके अलावा जलस्तर बढ़ने से अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप पर भी असर देखने को मिलेगा।

ग्लेशियर विशेषज्ञों (ग्लेशियोलॉजिस्ट्स) की एक टीम के नए शोध से पता चला है कि पश्चिमी अंटार्कटिका में स्थित ‘थ्वाइट्स ग्लेशियर’ तेजी से अपना ठोस से द्रव (पानी) में बदल रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि गर्म समुद्री पानी इसके नीचे घुसकर इसके मुख्य हिस्से को पिघला रहा है। शोध में वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं भी बढ़ती है, तब भी इसके कारण समुद्र के जलस्तर में 1.2 इंच (30 मिमी) की बढ़ोतरी हो सकती है।

‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में प्रकाशित यह शोध उन सबूतों में एक और कड़ी जोड़ते हैं जो बताते हैं कि यह ग्लेशियर, जो दशकों से सिकुड़ रहा था, अब वैज्ञानिकों के अनुमान से भी कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहा है। इस अध्ययन के लिए अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं ने नासा की ‘जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी’ के साथ मिलकर काम किया। इस दौरान उन्होंने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।

‘डूम्सडे ग्लेशियर’यानी ‘प्रलय का ग्लेशियर’ के नाम से मशहूर, थ्वाइट्स पृथ्वी का सबसे बड़ा ग्लेशियर है। यह लगभग 1,92,000 वर्ग किलोमीटर (74,130 वर्ग मील) के क्षेत्र में फैला हुआ है, जो लगभग गुजरात राज्य के आकार के बराबर है। यह पश्चिमी अंटार्कटिका के सुदूर इलाके में ‘मैरी बर्ड लैंड’ के ‘वालग्रीन कोस्ट’ पर स्थित है। यह विशाल ‘वेस्ट अंटार्कटिक आइस शीट’ का हिस्सा है, जिसमें अन्य ग्लेशियर भी शामिल हैं और जो थ्वाइट्स से 14 गुना बड़ा है। इस ग्लेशियर को पहली बार 1947 में मैप किया गया था। इसका नाम दिवंगत अमेरिकी ग्लेशियर विशेषज्ञ फ्रेडरिक टी. थ्वाइट्स के नाम पर रखा गया है, हालांकि वे कभी खुद वहां नहीं गए थे।

1980 के दशक में वैज्ञानिकों को पता चला कि थ्वाइट्स ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है। तब से वे इस ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, क्योंकि इसे लेकर चिंताएं लगातार बढ़ती गई हैं। इसके बहुत विशाल होने के कारण, अगर यह ग्लेशियर ढह जाता है, तो दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर खतरनाक हद तक बढ़ सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि ऐसा होने में अभी कई दशक, या शायद कुछ सदियां भी लग सकती हैं।

कई अध्ययनों के अनुसार, इसका मुख्य कारण समुद्र का गर्म पानी है, जो थ्वाइट्स ग्लेशियर को नीचे से पिघला रहा है। समुद्र का तापमान बढ़ने के पीछे इंसानों की वजह से हो रहा जलवायु परिवर्तन है, खासकर प्रदूषण फैलाने वाले जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ्यूल) का जलना। 2019 के एक अध्ययन में, नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी ने थ्वाइट्स ग्लेशियर के नीचे एक बहुत बड़ी कैविटी का पता लगाया। यह कैविटी 39.12 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई है। शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि इसी वजह से ग्लेशियर के पतला होने की प्रक्रिया तेज हो रही है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अनुसार, तापमान बढ़ने की वजह से साल 2000 से अब तक ग्लेशियरों की लगभग पांच प्रतिशत बर्फ पिघल चुकी है।

अध्ययन के अनुसार, साल 2100 तक थ्वाइट्स ग्लेशियर समुद्र के जलस्तर में 1.2 इंच (30 मिमी) तक की बढ़ोतरी कर सकता है—जो कि मौजूदा अनुमानों से दोगुना है। यह तब होगा, जब ग्लोबल वार्मिंग में कोई और बढ़ोतरी न भी हो। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि थ्वाइट्स के पिघलने से कितनी बर्फ नष्ट होगी, इसका सटीक अनुमान लगाने के लिए अभी और अध्ययन की आवश्यकता है। एक अन्य अध्ययन में, ‘ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे’ के वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि कम से कम अगले 150 वर्षों तक थ्वाइट्स से बर्फ का नुकसान जारी रहेगा। यह स्थिति तब भी बनी रहेगी, जब समुद्र का तापमान अत्यधिक ठंडा हो जाए।