‘RO की जरूरत नहीं, लकड़ी से साफ होगा पानी’, MIT वैज्ञानिकों ने बनाया अनोखा फिल्टर
अमेरिका की MIT (मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) के इंजीनियरों ने लड़की से पानी को साफ करने का तरीका निकाला है। उन्होंने सैपवुड (पेड़ की छाल के नीचे की लकड़ी) से पानी के फिल्टर बनाए हैं। इस मटीरियल में जाइलम नाम की छोटी-छोटी नलिकाएं होती हैं, जो पेड़ में पानी पहुंचाती हैं। इन नलिकाओं के बीच पतली झिल्लियां प्राकृतिक छलनी की तरह काम करती हैं। ये पानी को गुजरने देती हैं लेकिन गंदगी और अशुद्धियों को रोक लेती हैं।
रिसर्च के दौरान लैब टेस्ट में ट्रीट किए गए जाइलम फिल्टर ने 99 फीसदी से ज्यादा ईकोली और रोटावायरस (अशुद्धि) को हटा दिया। रिसर्चर्स ने भारत के स्थानीय पेड़ों से बने फिल्टर का भी टेस्ट किया और एक आसान फिल्ट्रेशन सिस्टम बनाने के लिए स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम किया। यानी भारत में भी ये तरीका काम कर सकता है।
MIT के इंजीनियरों ने सैपवुड की बनावट का इस्तेमाल करके पेड़ की टहनियों को फिल्टर में बदला। पाइन और जिन्कगो जैसे बिना फूल वाले पेड़ों में सैपवुड में जाइलम होता है। यह स्ट्रॉ जैसी नलिकाओं का एक नेटवर्क है, जो तने और टहनियों में पानी पहुंचाता है। ये नलिकाएं पतली झिल्लियों से जुड़ी होती हैं जो छलनी का काम करती हैं।
टीम ने पहले दिखाया था कि छिलका उतारी हुई सैपवुड बैक्टीरिया को फिल्टर कर सकती है लेकिन इस काम में उन समस्याओं को हल किया गया जो लकड़ी के सूखने पर आती थीं। ट्रीट किए गए जाइलम फिल्टर का टेस्ट दो तरह की अशुद्धियों- E. coli और रोटावायरस के खिलाफ़ किया गया। लैब के प्रयोगों में फिल्टर ने दोनों को 99% तक हटाया।
रिसर्चर्स ने दूषित झरने, नल और जमीनी पानी के स्रोतों से लिए गए पानी का टेस्ट किया और पाया कि फिल्टर बैक्टीरिया को हटा सकते हैं। रिसर्चर्स ने फिल्टर के डिजाइन को बेहतर बनाने के लिए समुदाय से मिले फीडबैक का इस्तेमाल किया। इसके बाद रिसर्चर्स इस टेक्नोलॉजी को भारत ले गए ताकि यह देखा जा सके कि यह लैब के बाहर कैसा काम करती है।
टीम ने दो साल तक भारत में पहाड़ी और शहरी इलाकों में अलग-अलग संगठनों के साथ काम किया और स्थानीय पाइन के पेड़ों से बने फिल्टर का टेस्ट किया। फिल्टर ने स्थानीय पीने के पानी के स्रोतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया को हटा दिया। भारत में किए गए फील्डवर्क से इस्तेमाल के लिए एक अच्छा प्रोटोटाइप तैयार हुआ है।
इसे इस्तेमाल करने के लिए ऊपर लगे एक बर्तन में पानी भरते हैं। इससे पानी एक मीटर लंबी ट्यूब से नीचे बहता है और जाइलम फिल्टर से गुजरकर वॉल्व-कंट्रोल्ड टोंटी से निकलता है। घरों की जरूरत के हिसाब से फिल्टर को रोज या हफ्ते में बदला जा सकता है। रिसर्चर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर इसके प्रोडक्शन के तरीकों पर काम कर रहे हैं।
