अंतरिक्ष में पैदा होंगे इंसान? चीन करने जा रहा सबसे खतरनाक प्रयोग, स्पेस में भेजा ‘आर्टिफिशियल भ्रूण’

चीन ने एक ऐसा स्पेस मिशन लॉन्च किया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. चीन ने सोमवार को Tianzhou-10 कार्गो स्पेसक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लॉन्च किया. यह मिशन केवल स्पेस स्टेशन के लिए सामान लेकर नहीं गया, बल्कि इसके साथ एक बेहद खास वैज्ञानिक प्रयोग भी भेजा गया है. इस मिशन में पहली बार अंतरिक्ष में “Artificial Embryo” यानी कृत्रिम भ्रूण के विकास का अध्ययन किया जाएगा. यह प्रयोग असली माइक्रोग्रैविटी और कॉस्मिक रेडिएशन जैसी परिस्थितियों में किया जा रहा है. वैज्ञानिक जानना चाहते हैं कि अंतरिक्ष में जीवन की शुरुआती प्रक्रिया किस तरह प्रभावित होती है.

चीनी एकेडमी ऑफ साइंसेज के अनुसार Tianzhou-10 मिशन में कुल 67 वैज्ञानिक उपकरण और सामग्री भेजी गई हैं जिनका वजन 768 किलोग्राम से ज्यादा है. इनका इस्तेमाल 41 अलग-अलग वैज्ञानिक प्रयोगों में किया जाएगा. इन प्रयोगों में लाइफ साइंस, बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोग्रैविटी फिजिक्स, एस्ट्रोनॉमी और अर्थ साइंस जैसी रिसर्च शामिल हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा Artificial Embryo वाले प्रयोग की हो रही है.

इस प्रोजेक्ट के मैनेजर यू लेकियान के मुताबिक असली मानव भ्रूण बड़े स्तर पर रिसर्च के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होते. इसलिए वैज्ञानिक स्टेम सेल्स की मदद से ऐसे स्ट्रक्चर तैयार करते हैं जो असली भ्रूण जैसे दिखते और व्यवहार करते हैं. इन्हें Artificial Embryos कहा जाता है. उन्होंने साफ किया कि ये असली इंसानी भ्रूण नहीं हैं और इनमें इंसान बनने की क्षमता नहीं होती. लेकिन इनकी मदद से शुरुआती मानव विकास को समझना आसान हो जाता है.

वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्रयोग मानव विकास के उस अहम चरण को समझने के लिए किया जा रहा है जो निषेचन के 14 से 21 दिनों के बीच होता है. इसी समय शरीर के सभी अंगों की शुरुआती संरचना बननी शुरू होती है. इसी दौरान यह तय होता है कि शरीर का कौन-सा हिस्सा सिर बनेगा और कौन-सा हिस्सा नीचे का भाग. अगर इस स्टेज में कोई गड़बड़ी हो जाए तो आगे चलकर शरीर में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं.

वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर जीवन अरबों साल तक गुरुत्वाकर्षण के बीच विकसित हुआ है. लेकिन अंतरिक्ष में, जहां लगभग शून्य गुरुत्वाकर्षण होता है, वहां स्तनधारी जीवों का विकास कैसे होगा, यह अभी तक साफ नहीं है. चीनी स्पेस स्टेशन वैज्ञानिकों को ऐसा माहौल देता है जिसे पृथ्वी पर पूरी तरह दोहराना संभव नहीं है. यहां लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी और असली कॉस्मिक रेडिएशन दोनों मौजूद रहते हैं. इसी वजह से वैज्ञानिक Artificial Embryos को स्पेस स्टेशन भेजकर देखना चाहते हैं कि शुरुआती विकास पर इसका क्या असर पड़ता है.

इस मिशन के दौरान Artificial Embryos को स्पेस स्टेशन में पांच दिनों तक विकसित किया जाएगा. वहां मौजूद अंतरिक्ष यात्री उनकी निगरानी करेंगे. ऑटोमेटेड सिस्टम हर दिन न्यूट्रिएंट सॉल्यूशन बदलेंगे ताकि विकास सही तरीके से हो सके. प्रयोग पूरा होने के बाद इन सैंपल्स को फ्रीज करके वापस पृथ्वी पर लाया जाएगा, जहां लैब में इनका विस्तार से विश्लेषण किया जाएगा.

यह प्रयोग केवल बायोलॉजी तक सीमित नहीं है. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर भविष्य में इंसान चांद या मंगल ग्रह पर बसना चाहता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या इंसान अंतरिक्ष में कई पीढ़ियों तक जीवित रह सकता है. यह मिशन उसी सवाल का शुरुआती जवाब खोजने की कोशिश है. वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इस रिसर्च से पता चल सकेगा कि अंतरिक्ष में मानव जीवन और प्रजनन संभव है या नहीं.