भारत का अनोखा फूल, खिलने में लगते हैं 12 साल
भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है और इसकी वजह सिर्फ यहां की अलग-अलग भाषाएं और संस्कृतियां नहीं हैं. कश्मीर की बर्फीली वादियों से लेकर कन्याकुमारी के समुद्री किनारों तक प्रकृति ने हर इलाके को अपने अलग रंग से सजाया है. कहीं ऊंचे पहाड़ हैं, कहीं घने जंगल, कहीं रेगिस्तान तो कहीं ऐसी घाटियां हैं, जहां पहुंचकर लगता है जैसे प्रकृति ने खुद कोई खूबसूरत तस्वीर बना दी हो. इन्हीं कुदरती नजारों के बीच केरल की पहाड़ियों में एक ऐसा फूल खिलता है, जिसका इंतजार लोगों को पूरे 12 साल तक करना पड़ता है. नाम है नीलकुरिंजी(Neelakurinji). जब यह फूल खिलता है तो मुन्नार और आसपास की पहाड़ियां हरे रंग से बैंगनी रंग में बदलती नजर आती हैं. यही वजह है कि इसके खिलने का इंतजार प्रकृति प्रेमियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी रहता है.
केरल को ‘ईश्वर का अपना देश’ कहा जाता है. यहां समुद्र, झरने, जंगल और पहाड़ मिलकर इसे बेहद खूबसूरत बनाते हैं. इसी राज्य में बसा है मुन्नार, जो समुद्र तल से करीब 1600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. मुन्नार चाय, कॉफी और मसालों के बागानों के लिए जाना जाता है। यहां की ठंडी हवा, हरियाली और पहाड़ियों का नजारा हर साल बड़ी संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है. लेकिन मुन्नार की पहचान सिर्फ इन चीजों तक ही नहीं है. यहां एक ऐसा फूल भी खिलता है, जो इस जगह को बाकी हिल स्टेशनों से अलग बना देता है. यह फूल है नीलकुरिंजी, जो अपनी दुर्लभता और खूबसूरती के लिए जाना जाता है.
नीलकुरिंजी की सबसे खास बात इसका खिलने का चक्र है. यह फूल करीब 12 साल में एक बार खिलता है. यानी अगर किसी ने इसे एक बार देखा, तो अगली बार उसी नजारे को देखने के लिए उसे लगभग 12 साल इंतजार करना पड़ सकता है. केरल में इसे आमतौर पर ‘कुरिंजी’ कहा जाता है. यह Strobilanthus समूह से जुड़ा पौधा है. इस समूह की भारत में कई प्रजातियां पाई जाती हैं और सभी के फूल खिलने का समय एक जैसा नहीं होता. कुछ प्रजातियां कुछ साल के अंतराल पर खिलती हैं, जबकि कुछ को इससे भी ज्यादा समय लगता है. नीलकुरिंजी का लंबा अंतराल ही इसे इतना खास बनाता है. मुन्नार की पहाड़ियों को आमतौर पर हरी-भरी वादियों के लिए जाना जाता है. लेकिन जब नीलकुरिंजी खिलता है तो यही पहाड़ियां बिल्कुल अलग दिखाई देने लगती हैं. दूर तक फैले बैंगनी फूल पहाड़ियों को किसी खूबसूरत पेंटिंग जैसा बना देते हैं. इसका फूल खिलने का मौसम आमतौर पर अगस्त से अक्टूबर के बीच देखा जाता है. इसी दौरान पर्यटक इस दुर्लभ नजारे को देखने के लिए मुन्नार और आसपास के ऊंचाई वाले इलाकों में पहुंचते हैं.
नीलकुरिंजी का प्राकृतिक आवास लगातार कम होने की वजह से इसके संरक्षण की जरूरत महसूस की गई. इसी उद्देश्य से केरल में कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी बनाया गया. साल 2006 में करीब 32 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को नीलकुरिंजी के संरक्षण के लिए सुरक्षित किया गया था. यह इलाका मुन्नार से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां नीलकुरिंजी की विभिन्न प्रजातियों और उनके प्राकृतिक वातावरण को सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है. इसके संरक्षण में स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कई अभियानों की भी भूमिका रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, कुरिंजीमाला सैंक्चुअरी में नीलकुरिंजी के फूलों को तोड़ना सख्त मना है. अगर कोई व्यक्ति फूल तोड़ता हुआ पकड़ा जाता है तो उस पर 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. एक समय नीलकुरिंजी कई इलाकों में बड़ी संख्या में प्राकृतिक रूप से उगता था, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्राकृतिक आवास कम होता गया. सड़कों को चौड़ा करने के लिए जमीन का इस्तेमाल, चाय और मसालों की खेती का विस्तार और दूसरे विकास कार्यों की वजह से उन इलाकों पर असर पड़ा, जहां नीलकुरिंजी के पौधे उगते थे. यही वजह है कि अब नीलकुरिंजी के प्राकृतिक आवास को बचाना और इसके संरक्षण पर ध्यान देना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस दुर्लभ फूल की खूबसूरती देख सकें.
